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देसी का माई बाप साल की सेवा के बाद रिटायर क्या है एटॉमिक क्लॉक जिसके बंद होते ही कबाड़ बना पूरा सिस्टम…


भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC (Navigation with Indian Constellation) की नींव रखने वाला पहला सैटेलाइट IRNSS-1A अब आधिकारिक तौर पर रिटायर हो गया है. करीब 10 साल तक सफलतापूर्वक सेवाएं देने के बाद इस उपग्रह का मिशन समाप्त हो गया. इसकी सबसे बड़ी वजह बनीं इसकी तीनों रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक, जो समय के साथ एक-एक करके काम करना बंद कर गईं. यही क्लॉक किसी भी नेविगेशन सैटेलाइट की सबसे अहम तकनीक मानी जाती है. इनके फेल होते ही सैटेलाइट लोकेशन बताने के अपने मूल काम के लायक नहीं रह जाता.

क्या है IRNSS-1A?

IRNSS-1A भारत के Indian Regional Navigation Satellite System (IRNSS) का पहला सैटेलाइट था. इसे 1 जुलाई 2013 को ISRO ने PSLV-C22 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया था. बाद में इसी IRNSS सिस्टम का नाम बदलकर NavIC रखा गया. NavIC का मकसद भारत और उसकी सीमाओं से लगभग 1500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में बेहद सटीक नेविगेशन सेवा उपलब्ध कराना है. यह भारत का अपना GPS सिस्टम है, जिससे देश को अमेरिका के GPS, रूस के GLONASS, यूरोप के Galileo और चीन के BeiDou जैसे विदेशी सिस्टम पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.

क्या होती है एटॉमिक क्लॉक?

अगर किसी नेविगेशन सैटेलाइट को इंसानी शरीर माना जाए, तो एटॉमिक क्लॉक उसका दिल और दिमाग दोनों होती है. जनरली क्लॉक, क्वार्ट्ज या मैकेनिकल सिस्टम पर चलती हैं, जबकि एटॉमिक क्लॉक परमाणुओं के कंपन (Atomic Vibrations) के आधार पर समय मापती है. इसकी सटीकता इतनी अधिक होती है कि यह करोड़ों वर्षों में भी मुश्किल से एक सेकंड की गलती करती है. नेविगेशन सिस्टम में समय ही सबसे बड़ी कुंजी है. सैटेलाइट लगातार पृथ्वी पर रेडियो सिग्नल भेजता है और स्मार्टफोन या नेविगेशन डिवाइस यह मापता है कि सिग्नल कितने समय में उसके पास पहुंचा. इसी समय के आधार पर आपकी सटीक लोकेशन तय होती है.

क्लॉक बंद होते ही क्यों बेकार हो गया सैटेलाइट?

सैटेलाइट की घड़ी में जरा-सी भी गड़बड़ी लोकेशन को पूरी तरह गलत कर सकती है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, एक माइक्रोसेकंड की समय संबंधी गलती भी किसी व्यक्ति की लोकेशन को सैकड़ों मीटर तक गलत दिखा सकती है. IRNSS-1A में लगी तीनों रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक समय के साथ खराब हो गईं. इनके बंद होने के बाद उपग्रह सही टाइमिंग सिग्नल नहीं भेज सका. यही कारण है कि तकनीकी रूप से वह अंतरिक्ष में मौजूद होने के बावजूद नेविगेशन सेवा देने के योग्य नहीं रहा.

क्यों खराब हुईं एटॉमिक क्लॉक?

रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक बेहद जटिल तकनीक पर आधारित होती हैं. अंतरिक्ष में लगातार रेडिएशन, अत्यधिक तापमान और वर्षों तक बिना किसी रखरखाव के काम करने के कारण इनमें खराबी आ सकती है. IRNSS-1A के साथ भी यही हुआ. पहले एक क्लॉक बंद हुई, फिर दूसरी और आखिर में तीसरी भी काम करना बंद कर गई. इसके बाद ISRO ने नए उपग्रह लॉन्च कर NavIC नेटवर्क को मजबूत बनाए रखा.

क्या आम लोगों पर पड़ेगा असर?

इस सवाल का जवाब है- नहीं. IRNSS-1A के रिटायर होने के बावजूद NavIC सिस्टम पूरी तरह चालू है. ISRO ने समय-समय पर नए सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, जिनमें IRNSS-1I समेत अन्य उपग्रह शामिल हैं. ये सभी मिलकर भारत की नेविगेशन सेवाएं सुचारु रूप से चला रहे हैं. यानी स्मार्टफोन में मैप चलाने, मछुआरों को समुद्र में दिशा बताने, सेना के ऑपरेशन, रेलवे, जहाजों और विमानन सेवाओं पर इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा.

NavIC क्यों है भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण?

NavIC केवल रास्ता बताने वाला सिस्टम नहीं है. यह देश की रणनीतिक सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. युद्ध, आपदा या किसी आपात स्थिति में अगर विदेशी GPS सेवाएं सीमित कर दी जाएं, तब भी भारत अपने स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम के जरिए काम कर सकता है. आज NavIC का इस्तेमाल सेना, नौसेना, एयरफोर्स, आपदा प्रबंधन एजेंसियों, मछुआरों, रेलवे और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में तेजी से बढ़ रहा है. कई स्मार्टफोन कंपनियां भी अब अपने डिवाइस में NavIC सपोर्ट दे रही हैं.

भविष्य की तैयारी

ISRO अब NavIC की अगली जनरेशन पर काम कर रहा है. आने वाले उपग्रह पहले से अधिक आधुनिक एटॉमिक क्लॉक, बेहतर सिग्नल और लंबी उम्र के साथ लॉन्च किए जाएंगे. इसके अलावा भारत भविष्य में NavIC की कवरेज और सटीकता दोनों बढ़ाने की योजना पर भी काम कर रहा है.



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