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Samudra Manthan Scheme: ईरान जंग नेशनल एनर्जी सिक्योरिटी की कड़ी परीक्षा ले रही है. ईरान और अमेरिका के बीच जारी सशस्त्र संघर्ष के चलते ग्लोबल एनर्जी सप्लाई कॉरिडोर होर्मुज स्ट्रेट से तेल और LPG से लदे जहाजों की आवाजाही बुरी तरह से प्रभावित हुई है. भारत पर भी इसका विपरीत असर पड़ा है. नेशनल एनर्जी सिक्योरिटी को ध्यान में रखते हुए भारत ने नई महत्वाकांक्षी योजना को ग्रीन सिग्नल दिया है.
समुद्र मंथन स्कीम को सरकार ने मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह गेमचेंजर साबित हो सकता है. (फाइल फोटो)
Samudra Manthan Scheme: देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘समुद्र मंथन’ (National Offshore Exploration Scheme) को मंजूरी दे दी है. ₹84084 करोड़ की लागत वाली यह योजना वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू की जाएगी. इसे भारत का अब तक का सबसे बड़ा ऑफशोर तेल और गैस खोज अभियान माना जा रहा है. सरकार का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य समुद्र की गहराइयों में छिपे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडारों की खोज तेज करना, घरेलू उत्पादन बढ़ाना और विदेशी आयात पर निर्भरता कम करना है.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है. देश हर साल करीब 144 अरब डॉलर (लगभग ₹13 लाख करोड़) का कच्चा तेल आयात करता है. हाल के वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों ने यह साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है. सरकार का मानना है कि यदि देश में ही अधिक तेल और गैस का उत्पादन होगा तो आयात बिल कम होगा, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और अर्थव्यवस्था को भी बड़ा लाभ मिलेगा.
समुद्र मंथन योजना में क्या-क्या होगा?
- ₹28534 करोड़ आधुनिक 2D और 3D सीस्मिक सर्वे तथा डेटा प्रोसेसिंग पर खर्च होंगे, ताकि समुद्र के भीतर संभावित तेल-गैस भंडारों की सटीक पहचान की जा सके.
- ₹43200 करोड़ की लागत से 60 गहरे समुद्री (Deepwater) कुएं खोदे जाएंगे. सरकार प्रत्येक पात्र परियोजना की ड्रिलिंग लागत का 50% या अधिकतम ₹675 करोड़ प्रति कुआं तक सहायता देगी.
- ₹10000 करोड़ साझा ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर खर्च किए जाएंगे, जिससे खोज के बाद उत्पादन जल्दी शुरू हो सके.
- ₹2000 करोड़ ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एवं सर्विस ज़ोन विकसित करने पर खर्च होंगे, ताकि जरूरी उपकरणों का निर्माण भारत में ही हो और आयात कम हो.
एक समुद्री कुएं पर कितना खर्च
इन इलाकों में एक गहरे समुद्री कुएं की लागत 125 से 150 मिलियन डॉलर तक होती है. ऐसे में सरकार जोखिम साझा करके निजी कंपनियों को निवेश के लिए प्रोत्साहित करेगी. साल 2014 के बाद सरकार ने इस क्षेत्र में कई बड़े सुधार किए हैं. पहले प्रतिबंधित रहे समुद्री क्षेत्रों का 99% हिस्सा अब खोज के लिए खोल दिया गया है. प्रोडक्शन शेयरिंग मॉडल की जगह रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल लागू किया गया. ऑयलफील्ड्स (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) संशोधन अधिनियम, 2025 और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियम, 2025 लागू कर कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाया गया. ओएनजीसी और ऑयल इंडिया के प्रदर्शन मानकों में खोज गतिविधियों को प्राथमिकता दी गई.
इन क्षेत्रों पर रहेगा फोकस?
- कृष्णा-गोदावरी बेसिन
- कावेरी बेसिन
- महानदी बेसिन
- अंडमान क्षेत्र
क्या होगा फायदा?
- भारत का घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन 62 MMTOE से बढ़कर 80 MMTOE प्रति वर्ष हो सकता है.
- देश का कुल हाइड्रोकार्बन संसाधन आधार 1.6 अरब टन ऑयल इक्विवेलेंट (TOE) से बढ़कर 2.2 अरब TOE तक पहुंच सकता है.
- कच्चे तेल के आयात पर हर साल लगभग ₹1 लाख करोड़ तक की बचत संभव है.
- ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, विदेशी निर्भरता घटेगी और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को नई मजबूती मिलेगी.
क्या है सरकार का संदेश?
सरकार का कहना है कि ‘समुद्र मंथन’ केवल एक योजना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा का मिशन है. आधुनिक तकनीक, जोखिम साझा करने की नीति, साझा इंफ्रास्ट्रक्चर और घरेलू विनिर्माण के जरिए भारत गहरे समुद्र में तेल और गैस खोजने की अपनी क्षमता को नई ऊंचाई पर ले जाएगा. इससे आने वाले वर्षों में देश की ऊर्जा जरूरतों को घरेलू उत्पादन के जरिए पूरा करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…
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