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Paddy Farming Tips: धान की खेती में 35 दिन की अवस्था पौधों की बढ़वार और बालियों के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस समय नाइट्रोजन का अधिक इस्तेमाल करने से पौधे में कल्ले तो ज्यादा निकल सकते हैं, लेकिन कई कल्ले बिना बाली के रह जाते हैं. प्रगतिशील किसान के अनुसार यूरिया की अनुशंसित मात्रा के साथ पोटाश और जिंक का संतुलित प्रयोग, उचित जल प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोगों की निगरानी करने से बांझ कल्लों की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है.
शाहजहांपुर: धान की खेती में अक्सर किसान पैदावार बढ़ाने के लिए अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं. इसके परिणामस्वरूप पौधे में कल्ले (Tillers) तो अधिक संख्या में निकल आते हैं, लेकिन उनमें से कई कल्ले बिना बाली के ही रह जाते हैं. इन्हें ‘अवांछित’ या ‘बांझ कल्ले’ कहा जाता है. 35 दिन की फसल धान के विकास का बहुत महत्वपूर्ण चरण होता है. यदि इस समय सही पोषण और प्रबंधन न मिले, तो बालियों का विकास प्रभावित होता है और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है.
प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह का कहना है कि नाइट्रोजन का अत्यधिक प्रयोग केवल वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा देता है, जिससे बांझ कल्लों की संख्या बढ़ती है. 35 दिन की अवस्था पर संतुलित उर्वरक प्रबंधन, विशेषकर पोटाश और जिंक का सही उपयोग, सभी कल्लों में स्वस्थ बाली बनने के लिए जरूरी है. इसके अलावा, सही समय पर सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण से पौधों को समान मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं. अगर किसान शुरुआत से ही सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित संतुलन बनाकर रखें, तो हर कल्ले से चमकदार और दानेदार बाली प्राप्त की जा सकती है.
उर्वरकों का संतुलित प्रयोग और नाइट्रोजन नियंत्रण
35 दिन की फसल में किसान अक्सर नाइट्रोजन की अधिक मात्रा डाल देते हैं, जिससे पौधे केवल लंबे और हरे दिखाई देते हैं, पर बालियां नहीं बनतीं हैं. इस समय यूरिया की केवल अनुशंसित मात्रा ही दें. नाइट्रोजन के साथ-साथ म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) का प्रयोग बेहद जरूरी है. पोटाश पौधों के तनों को मजबूत बनाता है और बालियों में दानों का भराव सही तरीके से सुनिश्चित करता है, जिससे बांझ कल्ले नहीं बनते हैं.
सूक्ष्म पोषक तत्वों और जिंक का प्रबंधन
धान की फसल में 35 दिनों के आसपास जिंक और सल्फर की कमी के कारण कल्लों का विकास रुक जाता है और वे कमजोर रह जाते हैं. इस अवस्था में जिंक सल्फेट का छिड़काव करने से पौधों की चयापचय क्रियाएं सुधरती हैं. अगर कल्ले कमजोर दिख रहे हों, तो एनपीके (19:19:19) या बायो-स्टिमुलेंट का पत्तियों पर छिड़काव करें. इससे हर कल्ले को समान पोषण मिलेगा और आगे चलकर उनमें बालियां जरूर निकलेंगी.
जल प्रबंधन और प्रकाश का सही संचार
खेत में लगातार पानी भरकर रखने से जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे कई कल्ले कमजोर होकर बिना बाली के रह जाते हैं. 35 से 40 दिन की अवस्था पर खेत का पानी कुछ दिनों के लिए सुखा दें, ताकि जड़ों में हवा लग सके. इसके बाद हल्की सिंचाई करें। जब पौधों की जड़ों तक हवा और सूरज की रोशनी सही ढंग से पहुंचती है, तो सभी कल्लों को मजबूती मिलती है.
खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोग रोकथाम
फसल की इस अवस्था पर खरपतवार पौधों के हिस्से का पोषण छीन लेते हैं, जिससे मुख्य पौधा तो बढ़ता है लेकिन कल्ले कमजोर रह जाते हैं. 35 दिन की फसल में खरपतवारों को निकालकर खेत साफ रखें. इसके साथ ही तना छेदक (Stem Borer) और जड़ सड़न जैसी बीमारियों पर नजर रखें. कीटों के हमले से प्रभावित कल्ले सूख जाते हैं और उनमें बाली नहीं बन पाती. सही समय पर कीटनाशक का प्रयोग कर फसल सुरक्षित करें.
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विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…
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