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अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया है कि ग्लॉ झील को भारत की 101वीं और राज्य की पहली रामसर साइट में शामिल किया गया है. हर तरफ से जंगल से घिरी और 20 किलोमीटर पैदल ट्रैक वाली ये झील पर्यटन के लिए बेहतरीन है. आइए जानते हैं इस झील के बारे में और रामसर साइट बनने के बाद क्या होगा बदलाव?
20 किलोमीटर तक पैदल जंगल पार करके अगर आप प्रकृति का अद्भुत नजारा देखना चाहते हैं तो ग्लॉ झील आपके लिए बेस्ट विकल्प है. भारत की इस झील को अब अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है. अरुणाचल प्रदेश की इस खूबसूरत झील को भारत की 101वीं रामसर साइट घोषित कर दिया गया है. आइए जानते हैं इसके बारे में..
जंगल, ट्रैकिंग, हरियाली, और नेचर के सुंदर नजारे समेटे यह झील पूर्वी हिमालय की गोद में छिपी एक छोटी-सी झील है.ग्लॉ झील को देखकर सालों से ट्रेकर्स और नेचर लवर्स मंत्रमुग्ध होते रहे हैं. अब इस झील को भारत की 101वीं और राज्य की पहली रामसर साइट का दर्जा मिल गया है.
रामसर साइट दरअसल एक अंतरराष्ट्रीय पहचान है. 1971 में ईरान के रामसर शहर में एक समझौता हुआ था. इसमें दुनिया के देशों ने मिलकर कहा कि जो दलदली जगहें या झीलें पर्यावरण के लिए बहुत जरूरी हैं, उन्हें हर कीमत पर बचाना चाहिए. ऐसी जगहों को रामसर साइट कहा जाता है. अब यह ग्लॉ झील भी इसी में शुमार हो गई है.
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केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 3 अगस्त को खुद इसकी घोषणा की है. उन्होंने कहा कि झील को मिली ये पहचान और उपलब्धि जैव विविधता बचाने, पानी की सुरक्षा और जलवायु बदलाव से निपटने में मदद करेगी. उन्होंने यह भी बताया कि 2014 तक भारत में सिर्फ 26 रामसर साइटें थीं, लेकिन पिछले 12 साल में यह संख्या बढ़कर 101 हो गई है.
दरअसल ग्लॉ झील पर्यटन का बेहतरीन डेस्टिनेशन होने के साथ ही पर्यावरण के लिए बेहद जरूरी है. ग्लॉ झील पहाड़ी नालों से भरी रहती है. इसके आसपास घने जंगल हैं. यहां 150 से ज्यादा तरह के पेड़-पौधे और 49 तरह के ऑर्किड पाए जाते हैं. यह झील शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर और वहां पहुंचने के लिए जंगल का पैदल ट्रैक पार करना पड़ता है.
खास बात है कि ये झील कमलंग वन्यजीव अभयारण्य के अंदर मौजूद है. ऐसे में यहां हाथी, तेंदुआ बिल्ली, जंगली सूअर, हिरण, विशाल गिलहरी और उड़ने वाली गिलहरी जैसे कई जानवर रहते हैं. पास में ही परशुराम कुंड भी है, जो एक पवित्र तीर्थ स्थल माना जाता है. लिहाजा यहां आने वाले पर्यटकों को यहां एकदम प्राकृतिक नजारा देखने को मिलता है.
स्थानीय मिश्मी जनजाति की दिलचस्प मान्यताएं भी हैं. वे मानते हैं कि झील में चार देवता रहते हैं, दो लड़के और दो लड़कियां. ये देवता झील और आने-जाने वालों की रक्षा करते हैं. लोग कहते हैं कि इस झील में कोई नहीं डूब सकता. एक और अजब बात ये है कि चारों तरफ घने जंगल होने के बावजूद झील की सतह पर पत्ते या टहनियां नहीं दिखतीं. पहली बार आने वाले अक्सर यहां हल्की बारिश का स्वागत पाते हैं.
बता दें कि इस ग्लॉ झील को घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से अप्रैल तक है. इस मौसम में यहां मौसम सुहावना रहता है और ट्रेकिंग करना भी आसान होता है. अगर आप शांत जगह, घने जंगल और थोड़ी रहस्यमयी कहानियां पसंद करते हैं, तो ये झील आपके लिए बिल्कुल सही है. आप अगली छुट्टी में यहीं का प्लान बना सकते हैं.