365 Days Leave For Third Child Explained: तमिलनाडु में थलापति विजय सरकार ने आबादी बढ़ाने के लिए एक बड़ी जंग छेड़ दी है. सरकार ने तीसरे बच्चे को लेकर बड़ा फैसला किया है. अब राज्य की महिला सरकारी कर्मचारियों को तीसरे बच्चे के जन्म पर भी 365 दिन यानी पूरे एक साल की सवेतन मैटरनिटी लीव मिलेगी. पहले तीसरे बच्चे के मामले में यह छुट्टी सिर्फ 12 हफ्ते यानी 84 दिन तक सीमित थी. सरकार के इस फैसले ने एक नई बहस छेड़ दी है. सवाल उठ रहा है कि क्या तमिलनाडु अब बढ़ती उम्र और घटती जन्मदर से परेशान है. इसी कारण उसने आबादी बढ़ाने की मुहिम छेड़ दी है. राज्य सरकार का कहना है कि यह फैसला महिलाओं के कल्याण और उन्हें काम के साथ परिवार की जिम्मेदारियां निभाने में मदद देने के लिए लिया गया है. इसे सीधे तौर पर ज्यादा बच्चे पैदा करने की मुहिम नहीं कहा गया है. फिर भी, तीसरे बच्चे पर एक साल की छुट्टी का फैसला तमिलनाडु की पुरानी जनसंख्या नीति से अलग जरूर नजर आता है.
तीसरे बच्चे पर अब 365 दिन की छुट्टी
पहले तमिलनाडु में जिन महिला सरकारी कर्मचारियों के दो से कम जीवित बच्चे थे, उन्हें 365 दिन की मैटरनिटी लीव मिलती थी. लेकिन तीसरे बच्चे के जन्म पर छुट्टी घटकर सिर्फ 12 हफ्ते रह जाती थी. अब सरकार ने यह अंतर खत्म कर दिया है. तीसरे बच्चे के जन्म पर भी महिला कर्मचारी को 365 दिन की छुट्टी मिलेगी. यानी छुट्टी 84 दिन से बढ़कर 365 दिन हो गई है. यह पहले की तुलना में चार गुने से भी ज्यादा है. इस फैसले का सीधा फायदा राज्य सरकार की महिला कर्मचारियों को मिलेगा. उन्हें बच्चे की देखभाल, प्रसव के बाद स्वास्थ्य लाभ और परिवार को समय देने के लिए पूरे एक साल का भुगतान वाला अवकाश मिल सकेगा.
क्या बच्चे पैदा करने को प्रोत्साहित कर रही?
सरकार ने तीसरे बच्चे के लिए कोई अलग आर्थिक प्रोत्साहन घोषित नहीं किया है. न कोई नकद राशि मिलेगी और न ही तीसरा बच्चा पैदा करने पर कोई विशेष बोनस या टैक्स छूट दी गई है. इसलिए इसे सीधे तौर पर ‘तीन बच्चे पैदा करो’ वाली नीति कहना सही नहीं होगा. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. किसी महिला के लिए तीसरे बच्चे का फैसला केवल परिवार का मामला नहीं होता. नौकरी, आय, बच्चे की देखभाल और करियर भी इससे जुड़े होते हैं. एक साल की सवेतन छुट्टी इन चिंताओं को काफी हद तक कम कर सकती है. यही वजह है कि इस फैसले को तमिलनाडु की बदलती जनसांख्यिकी के संदर्भ में भी देखा जा रहा है.
भारत में तीसरे बच्चे पर कितनी छुट्टी?
केंद्र के मातृत्व लाभ कानून के तहत पहले दो जीवित बच्चों के लिए पात्र महिला कर्मचारियों को 26 हफ्ते यानी करीब छह महीने की सवेतन मातृत्व छुट्टी मिलती है. तीसरे और उसके बाद के बच्चों के लिए यह अवधि 12 हफ्ते है. यानी तमिलनाडु का नया फैसला तीसरे बच्चे के मामले में केंद्र के सामान्य कानूनी प्रावधान से काफी आगे जाता है. हालांकि, एक बात समझना जरूरी है. तमिलनाडु का यह फैसला राज्य सरकार की महिला कर्मचारियों के लिए है. इसका मतलब यह नहीं है कि देशभर की निजी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं को तीसरे बच्चे पर अपने आप 365 दिन की छुट्टी मिलने लगेगी.
तमिलनाडु में क्यों बदली तस्वीर?
तमिलनाडु लंबे समय से जनसंख्या नियंत्रण के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में रहा है. शिक्षा, शहरीकरण और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के साथ यहां जन्मदर में लगातार गिरावट आई है. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. कम जन्मदर के साथ आबादी के बूढ़े होने की चिंता बढ़ रही है. कामकाजी उम्र वालों की आबादी में हिस्सा भविष्य में घट सकता है. बुजुर्गों की संख्या बढ़ सकती है. ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण के दौर से निकलकर नीति की बहस अब परिवारों को ज्यादा सुविधाएं देने की तरफ बढ़ रही है.
तीसरे बच्चे की छुट्टी को लेकर कानूनी लड़ाई
तीसरे बच्चे पर मैटरनिटी लीव का मुद्दा तमिलनाडु में अदालत तक पहुंच चुका है. 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने के. उमादेवी बनाम तमिलनाडु सरकार मामले में तीसरे बच्चे के कारण सरकारी कर्मचारी को मातृत्व लाभ से पूरी तरह वंचित करने के खिलाफ महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी. इसके बाद मार्च 2026 में तमिलनाडु सरकार ने तीसरे बच्चे के लिए 12 हफ्ते की छुट्टी का आदेश जारी किया. इस पर भी सवाल उठे. अप्रैल में मद्रास हाई कोर्ट ने इस पाबंदी को उचित नहीं माना और कहा कि तीसरी बार मां बनने वाली महिला को प्रसव और बच्चे की देखभाल की जरूरत कम नहीं हो जाती. अब सरकार ने तीसरे बच्चे को भी 365 दिन की छुट्टी के दायरे में ला दिया है.
क्या इससे तमिलनाडु में बड़े परिवार बढ़ेंगे?
सिर्फ मैटरनिटी लीव के आधार पर यह कहना मुश्किल है. किसी परिवार के तीसरा बच्चा पैदा करने के फैसले पर कई चीजों का असर पड़ता है. महंगाई, घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, चाइल्ड केयर, महिलाओं का करियर और परिवार में घरेलू जिम्मेदारियों का बंटवारा इनमें प्रमुख हैं. फिर भी एक साल की सवेतन छुट्टी तीसरे बच्चे के फैसले को सरकारी महिला कर्मचारियों के लिए पहले की तुलना में आसान जरूर बना सकती है.
यही इस फैसले का सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय पहलू है. तमिलनाडु ने तीसरे बच्चे पर मिलने वाले लाभ को कम करने के बजाय बढ़ा दिया है. ऐसे समय में जब कई विकसित भारतीय राज्यों के सामने घटती जन्मदर और बढ़ती उम्र की आबादी चुनौती बन रही है, यह बदलाव खास महत्व रखता है. इस फैसले को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है. विजय सरकार में साझेदारी कांग्रेस ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि यह महिलाओं के स्वास्थ्य और उनके हित के हिसाब से लिया गया फैसला है. इसका मकसद आबादी बढ़ाने को प्रोत्साहित करना नहीं है.