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पिता के हाथों में लगी चोट तो बेटियों ने थाम ली स्टेयरिंग उधमपुर की दो बेटियों की कहानी कर देगी भावुक…


कभी किताबों में भविष्य तलाशती हैं, तो कभी बस की स्टेयरिंग थामकर परिवार का आज संभालती हैं. एक तरफ पढ़ाई की चिंता, दूसरी तरफ घर चलाने की जिम्मेदारी… जम्मू-कश्मीर के उधमपुर की दो बहनों की कहानी उन तमाम सवालों का जवाब है, जो आज भी बेटियों की काबिलियत को उनके जेंडर से जोड़कर देखते हैं. बंजीत कौर और देविंदर कौर आज सिर्फ अपने सपनों के लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए भी मेहनत कर रही हैं. सुबह स्कूल बस की स्टेयरिंग, दिन में ऑटो और जब भी वक्त मिलता है, किताबें… यही इन दोनों बहनों की जिंदगी बन चुकी है.

बंजीत और देविंदर के पिता स्कूल बस और ऑटो चलाकर परिवार का खर्च चलाते थे. उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को पहले ही ड्राइविंग सिखा दी थी. मकसद था कि बेटियां किसी पर निर्भर न रहें और जरूरत पड़ने पर अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. लेकिन कुछ समय पहले पिता सीढ़ियों से गिर गए. उनके बाजू में गहरी चोट लगी और उनके लिए बस और ऑटो चलाना मुश्किल हो गया. परिवार के सामने रोजमर्रा का खर्च चलाने की चुनौती खड़ी हो गई. ऐसे वक्त में दोनों बेटियों ने पीछे हटने के बजाय पिता का काम संभालने का फैसला किया.

अब दोनों बहनें बस और ऑटो की स्टेयरिंग संभालती हैं. लेकिन उन्होंने इसके लिए अपनी पढ़ाई को पीछे नहीं छोड़ा है. काम के बीच जब भी कुछ वक्त मिलता है, वह उनके लिए पढ़ाई का समय बन जाता है. सवारियों के इंतजार में खड़ी दोनों बहनों के पास किताबें होती हैं. कुछ पल स्टेयरिंग के पीछे गुजरते हैं तो कुछ पल किताबों के पन्नों के बीच. उनकी जिंदगी में अब दो रास्ते साथ-साथ चल रहे हैं- एक परिवार की जिम्मेदारी का और दूसरा अपने भविष्य का.

लड़कियों को बस और ऑटो चलाते देखकर लोगों की नजरें भी उन पर टिकती हैं. ऑटो स्टैंड पर तरह-तरह की बातें भी सुननी पड़ती हैं. लेकिन बंजीत और देविंदर ने इन बातों को अपनी राह में दीवार नहीं बनने दिया. उनका मानना है कि अगर परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए उन्हें काम करना पड़ रहा है, तो समाज क्या कहता है, इस पर ध्यान देने का कोई मतलब नहीं.

दोनों का कहना है, ‘हमारी जरूरतें पूरी करने कोई नहीं आएगा, फिर हम किसी की बातों पर ध्यान क्यों दें.’ यह एक छोटा सा जवाब है, लेकिन इसके पीछे उनकी पूरी जिंदगी की कहानी छिपी है.

इस परिवार में चार बेटियां हैं. पिता दो बेटियों की शादी कर चुके हैं. अब बंजीत और देविंदर अपने माता-पिता का सहारा बनने के साथ-साथ अपने भविष्य के लिए भी मेहनत कर रही हैं. दोनों अपनी शादी के लिए भी पैसे जोड़ रही हैं. लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने माता-पिता का साथ देना है.

दोनों बहनों का कहना है कि वे अपने माता-पिता को कभी यह महसूस नहीं होने देंगी कि उनके घर में बेटा नहीं है. उनकी यह बात सिर्फ एक भावुक वाक्य नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी की तस्वीर है जिसे दोनों ने अपनी इच्छा से अपने कंधों पर लिया है.

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