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भारत में कुल कितने झरने हैं और कितने सूख गए? सरकारी रिपोर्ट ने सबको हिला दिया

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भारत में कुल कितने झरने हैं? जल शक्ति मंत्रालय इस सवाल का जवाब ढूंढ रहा है. पहले स्प्रिंग सेंसस में 10 राज्यों के 14,468 झरनों का डेटा सामने आया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक मणिपुर और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा झरने दर्ज किए गए हैं. वहीं हजारों कुदरती जलस्रोत अब सूखने की कगार पर पहुंच चुके हैं. देश की लगभग 20 करोड़ आबादी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इन्हीं झरनों पर निर्भर है. ऐसे में अनियंत्रित विकास और घटते जलस्रोतों ने गंभीर खतरे की घंटी बजा दी है. (All Photos : PTI)

देश के इतिहास में पहली बार कुदरती झरनों का व्यापक डेटा तैयार किया गया है. जल शक्ति मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट ने पूरे देश को चौंका दिया है. भारत मंडपम में संपन्न हुए नौवें ‘भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह’ में यह सेंसस जारी हुआ. रिपोर्ट के दूसरे खंड में 10 राज्यों के 14,468 झरनों की वास्तविक स्थिति दर्ज की गई है. इस सर्वे में मणिपुर और महाराष्ट्र सबसे ऊपर हैं. सबसे डरावनी बात यह है कि सैकड़ों सदानीरा झरने अब तेजी से सूख रहे हैं.

नीति आयोग के अनुसार देश की 15 प्रतिशत आबादी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इन्हीं झरनों पर टिकी है. लगभग 20 करोड़ लोगों का जीवन सीधे तौर पर इन कुदरती जलस्रोतों से जुड़ा हुआ है. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में भयंकर जल संकट खड़ा हो सकता है.

जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट ‘फर्स्ट सेंसस ऑफ स्प्रिंग्स’ देश भर के जलस्रोतों का असली आईना दिखाती है. इस सर्वे में पूर्वोत्तर से लेकर पश्चिमी और दक्षिणी भारत के 10 प्रमुख राज्यों को शामिल किया गया. इसमें मणिपुर कुल 3,941 झरनों के साथ देश भर में पहले स्थान पर दर्ज हुआ है. वहीं महाराष्ट्र 3,652 झरनों के साथ दूसरे पायदान पर मौजूद है.

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ओडिशा में 1,957 और पश्चिम बंगाल में 1,686 झरनों की पहचान की गई है. छोटे तटीय राज्य गोवा में भी 1,196 झरने रिकॉर्ड किए गए हैं. इसके अलावा त्रिपुरा में 1,049 और असम में 792 झरने सामने आए हैं. दक्षिण भारत के तेलंगाना में 148 और आंध्र प्रदेश में 34 झरने मिले हैं. वहीं रेगिस्तानी राज्य राजस्थान में केवल 13 झरने दर्ज हुए हैं. यह डेटा बताता है कि देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में पानी का कुदरती तंत्र किस तरह फैला हुआ है.

महाराष्ट्र और मणिपुर दोनों ही राज्यों में झरनों की संख्या बहुत ज्यादा है लेकिन वहां का संकट भी बेहद गहरा है. महाराष्ट्र के कुल 3,652 झरनों में से 2,629 बारहमासी हैं. राज्य में 909 झरने मौसमी हैं और 114 पूरी तरह सूख चुके हैं. यहां के 3,612 झरने ग्रामीण इलाकों में हैं और केवल 40 शहरी क्षेत्रों में आते हैं. राज्य के 86.5 प्रतिशत झरने सार्वजनिक हैं जबकि 13.5 प्रतिशत निजी हाथों में हैं. चिंता की बात यह है कि महाराष्ट्र के 265 झरने गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं.

पूर्वोत्तर के मणिपुर राज्य में स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक नजर आती है. मणिपुर के कुल 3,941 झरनों में से 3,419 बारहमासी और 457 मौसमी हैं. वहां के 65 झरने पहले ही दम तोड़ चुके हैं. राज्य के 91.4 प्रतिशत झरने सार्वजनिक संपत्ति हैं. सबसे हैरान करने वाला आंकड़ा यह है कि मणिपुर के 1,336 झरने आज भारी खतरे में हैं. यहां के 3,127 झरनों का पानी स्थानीय निवासी पीते हैं. वहीं 634 का इस्तेमाल बाहर के लोग और 113 झरनों का पानी जंगली जानवर पीते हैं. यह आंकड़ा साफ करता है कि इन जलस्रोतों का सूखना पूरे ईकोसिस्टम को बर्बाद कर देगा.

ओडिशा और पश्चिम बंगाल के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में झरने जीवन रेखा का काम करते हैं. ओडिशा के 1,957 झरनों में से 1,568 बारहमासी और 315 मौसमी हैं. राज्य में 74 झरने सूख चुके हैं और 295 झरने गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं. यहां के 99.2 प्रतिशत झरने ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं. इनमें से लगभग 96 प्रतिशत जलस्रोत सरकारी और सार्वजनिक नियंत्रण में हैं.

पश्चिम बंगाल के आंकड़े भी बेहद संवेदनशील तस्वीर पेश करते हैं. राज्य के 1,686 झरनों में से 1,568 ग्रामीण इलाकों में मौजूद हैं. पहाड़ी जिले दार्जिलिंग में 1,200 और कलिम्पोंग में 427 झरने पाए गए हैं. इन दोनों जिलों के ग्रामीण और जनजातीय समुदायों के लिए यह पानी पीने का मुख्य सहारा है.

गोवा जैसे तटीय राज्य में 1,196 झरने दर्ज किए गए हैं. इनमें 1,105 बारहमासी हैं जबकि 25 झरने सूख चुके हैं. गोवा में 61 झरनों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है. त्रिपुरा के सभी 1,049 झरने ग्रामीण अंचलों में हैं. वहां सबसे ज्यादा 398 झरने धलाई जिले में रिकॉर्ड किए गए हैं. असम के 792 झरनों में से 587 गांवों में और 205 शहरों में स्थित हैं. राजस्थान के 13 झरनों में से 10 गांवों में हैं और सभी सार्वजनिक हैं.

इस रिपोर्ट में नीति आयोग की 2018 की महत्वपूर्ण स्टडी का हवाला दिया गया है. उसके मुताबिक देश की लगभग 15 प्रतिशत आबादी सीधे तौर पर झरनों के पानी पर टिकी है. करीब 20 करोड़ लोग अपनी दैनिक जरूरतों के लिए पूरी तरह इन्हीं पर निर्भर हैं. खास तौर पर हिमालयी और पहाड़ी राज्यों में झरने ही जीवन का मुख्य आधार हैं.

जब ये झरने सूखते हैं तो पूरे इलाके में पलायन और सूखे की नौबत आ जाती है. इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाता है. अंधाधुंध निर्माण कार्य और जंगलों की कटाई से झरनों का कैचमेंट एरिया नष्ट हो रहा है. इसके अलावा क्लाइमेट चेंज और अनियमित बारिश के कारण भी ये जलस्रोत सूख रहे हैं. अगर यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले वर्षों में पानी की भारी किल्लत पैदा होगी.

जल शक्ति मंत्रालय ने इस रिपोर्ट में झरनों को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं. सबसे पहले कमजोर और गंभीर स्थिति वाले झरनों की वैज्ञानिक मैपिंग करने की बात कही गई है. बुनियादी ढांचे के विकास के दौरान इन जलस्रोतों का संरक्षण अनिवार्य होना चाहिए. सड़क और टनल निर्माण के समय वाटर स्प्रिंग्स के रास्तों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए.

रिपोर्ट में स्प्रिंग-शेड मैनेजमेंट के लिए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने पर बल दिया गया है. इससे पहले बिहार, कर्नाटक, केरलम, लद्दाख, सिक्किम और तमिलनाडु को शामिल करते हुए खंड-दो की पहली रिपोर्ट जारी हुई थी. अब इन सभी राज्यों के डेटा को मिलाकर व्यापक जल नीति बनाने की जरूरत है. स्थानीय समुदायों को जोड़कर ही इन कुदरती जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सकता है. यह काम जितनी जल्दी शुरू होगा, देश का जल सुरक्षा तंत्र उतना ही मजबूत बनेगा.

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