नई दिल्ली. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की राजनीति का जिक्र होते ही दलित आंदोलन, बहुजन राजनीति और मायावती का नाम सामने आता है. लेकिन कांशीराम के राजनीतिक सफर का एक बेहद अहम पड़ाव उत्तर प्रदेश का इटावा रहा है. यही वह जमीन थी, जहां से कांशीराम पहली बार लोकसभा की दहलीज तक पहुंचे और संसद में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. खास बात यह है कि जिस इटावा को समाजवादी राजनीति का मजबूत गढ़ माना जाता था, वहीं से कांशीराम ने चुनावी जीत हासिल की थी.
1991 का इटावा उपचुनाव, जब ‘यादव गढ़’ में दौड़ा बसपा का हाथी
कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले में हुआ था. सामाजिक आंदोलन से अपनी राजनीतिक पहचान बनाने वाले कांशीराम ने चुनावी राजनीति में कदम रखने के बाद उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया. साल 1991 का लोकसभा चुनाव उनके राजनीतिक सफर में ऐतिहासिक साबित हुआ. इटावा लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांशीराम बसपा के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे. इस चुनाव में उनके सामने कुल 48 प्रत्याशी थे. कांशीराम को 1,44,290 वोट मिले. उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी बीजेपी के लाल सिंह वर्मा को उनसे करीब 22 हजार वोट कम मिले. इस जीत के साथ ही कांशीराम पहली बार लोकसभा पहुंचे.
इटावा चुनाव के दौरान कांशीराम लगभग एक महीने तक इटावा के प्रसिद्ध अनुपम होटल के कमरा नंबर 6 में ठहरे थे. फाइल फोटो
इटावा का वह होटल और मुलायम सिंह यादव की मेहमाननवाजी
इटावा चुनाव के दौरान कांशीराम लगभग एक महीने तक इटावा के प्रसिद्ध अनुपम होटल के कमरा नंबर 6 में ठहरे थे. स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मुलायम सिंह यादव आए दिन होटल फोन करके कांशीराम का हाल-चाल लेते थे और होटल प्रबंधन को साफ निर्देश दिए थे कि ‘कांशीराम हमारे विशेष मेहमान हैं, उन्हें किसी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए.’
इटावा की जीत से निकला 1993 का ऐतिहासिक गठबंधन
लेकिन इस चुनाव की कहानी सिर्फ कांशीराम की जीत तक सीमित नहीं थी. इसके पीछे उस दौर के उत्तर प्रदेश की बदलती सामाजिक और राजनीतिक गणित भी छिपी थी. इटावा को उस दौर में मुलायम सिंह यादव की राजनीति का मजबूत किला माना जाता था. मुलायम सिंह यादव खुद इटावा की राजनीति से निकले थे और यादव-मुस्लिम समीकरण के सहारे समाजवादी राजनीति को मजबूत कर रहे थे. ऐसे में इटावा से कांशीराम का जीतना सामान्य राजनीतिक घटना नहीं थी. यह उस दौर में दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीति के बीच बन रहे नए समीकरण का संकेत था.
बसपा-सपा का खट्टा-मीठा दौर
कांशीराम की जीत में मुलायम सिंह यादव की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं होती रही हैं. उस चुनाव में मुलायम के करीबी माने जाने वाले राम सिंह शाक्य जनता पार्टी के उम्मीदवार थे. उन्हें करीब 82,624 वोट मिले. चुनावी समीकरणों ने कांशीराम के लिए रास्ता आसान किया और वह संसद तक पहुंचने में कामयाब रहे. यही वह दौर था जब कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के बीच राजनीतिक नजदीकियां बढ़नी शुरू हुईं.
1991 के बाद उत्तर प्रदेश में कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के बीच राजनीतिक तालमेल मजबूत हुआ. फाइल फोटो.
कांशीराम-मुलायम की जुगलबंदी ने बदल दी यूपी की राजनीति
1991 के बाद उत्तर प्रदेश में कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के बीच राजनीतिक तालमेल मजबूत हुआ. दोनों नेताओं की राजनीति का सामाजिक आधार अलग था, लेकिन दोनों को कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक मोर्चे की जरूरत महसूस हो रही थी. कांशीराम दलितों को राजनीतिक ताकत बनाना चाहते थे, जबकि मुलायम पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर रहे थे. यही सामाजिक समीकरण आगे चलकर ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ जैसे राजनीतिक नारे की जमीन बना. सपा और बसपा का यह तालमेल बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन गया.
फिर आया 2 जून 1995 का गेस्ट हाउस कांड
इस गठजोड़ का सबसे बड़ा राजनीतिक असर 1993 के विधानसभा चुनाव में दिखाई दिया. बीजेपी के राम मंदिर आंदोलन के उभार के बीच सपा और बसपा साथ आए और सरकार बनाने में सफल रहे. मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और बसपा ने सरकार को समर्थन दिया. लेकिन सपा-बसपा की यह दोस्ती ज्यादा समय तक नहीं चल सकी. 2 जून 1995 को लखनऊ के गेस्ट हाउस में मायावती के साथ हुई घटना ने दोनों दलों के रिश्तों को हमेशा के लिए बदल दिया. बसपा ने मुलायम सिंह यादव सरकार से समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद बीजेपी के समर्थन से मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं.
गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा के बीच राजनीतिक दुश्मनी इतनी बढ़ी कि दोनों दल लंबे समय तक एक-दूसरे के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बने रहे. जिस राजनीतिक दोस्ती की शुरुआत कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के दौर में हुई थी, वही आगे चलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्विताओं में बदल गई.
2019 में फिर साथ आए अखिलेश-मायावती
करीब ढाई दशक बाद सपा और बसपा ने एक बार फिर इतिहास दोहराने की कोशिश की. 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव और मायावती ने हाथ मिलाया. दोनों दलों ने बीजेपी के खिलाफ गठबंधन बनाया. उस समय माना गया कि यादव, दलित और मुस्लिम वोटों का गणित बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. लेकिन चुनाव परिणामों ने तस्वीर कुछ अलग दिखाई. बसपा को गठबंधन का फायदा मिला और पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 10 लोकसभा सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी सिर्फ 5 सीटों पर सिमट गई. चुनाव के बाद मायावती ने सपा के वोट ट्रांसफर को लेकर सवाल उठाए. दोनों दलों के बीच फिर तल्खी बढ़ गई और गठबंधन टूट गया.
2019 के लोकसभा चुनाव में मंचों पर मायावती का खूब सम्मान करते देखे जाते थे अखिलेश यादव.
कांशीराम से मायावती तक… और फिर बदल गया पूरा समीकरण
इटावा से कांशीराम की 1991 की जीत सिर्फ एक लोकसभा चुनाव की जीत नहीं थी. यह उत्तर प्रदेश में बहुजन राजनीति के राष्ट्रीय मंच पर पहुंचने का महत्वपूर्ण पड़ाव था. कांशीराम ने दलित राजनीति को सत्ता की राजनीति से जोड़ने की कोशिश की. मुलायम सिंह यादव ने पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के सामाजिक गठजोड़ को मजबूत किया. दोनों की राजनीतिक जरूरतों ने एक समय उन्हें करीब ला दिया. लेकिन सत्ता और नेतृत्व के सवालों ने इस दोस्ती को दुश्मनी में बदल दिया. आज जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर नए सामाजिक समीकरणों की चर्चा हो रही है, तब करीब तीन दशक पुरानी यह कहानी फिर प्रासंगिक हो जाती है.
इटावा से शुरू हुई कांशीराम की संसदीय यात्रा ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में पहचान दिलाई, वहीं मुलायम-कांशीराम की दोस्ती ने यूपी की राजनीति में एक ऐसा प्रयोग किया जिसने बीजेपी को सत्ता से बाहर कर दिया. लेकिन 1995 का गेस्ट हाउस कांड उसी प्रयोग के अंत की शुरुआत भी बन गया.