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मोदी के खिलाफ मोर्चा लेकिन यूपी पंजाब में खुद बिखरा विपक्ष चुनावी मैदान में लाइन लेंथ क्यों बिगड़ी…


इंडी वाले और कॉकरोच पार्टी वाले ज्ञानेश कुमार के नाम पर सड़क गरम किए हुए हैं. मांग इस्तीफे की है और निशाना प्रधानमंत्री पर है. गांधी जयंती पर दिल्ली में जंतर मंतर और मुबई में शिवाजी पार्क पर मोर्चा खोला. माहौल पूरा बनाने की कोशिश की, लेकिन जहां असली परीक्षा है. जनता की कसौटी पर खरा उतरना है, वहां फेल होते दिख रहे हैं. जहां सीट और कुर्सी पर दांव है, वहां एक दूसरे को ही आइना दिखा रहे हैं. यूपी में कांग्रेस 150 सीट मांग रही है तो समाजवादी पार्टी इन्हें 50 सीटों के लायक भी नहीं समझ रही है.

पंजाब में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग इस्तीफा दे चुके हैं इसके बाद चन्नी और अमरिंदर खेमा एक छत के नीचे नहीं बैठ पा रहे हैं. पंजाब में आम आदमी पार्टी कांग्रेस को बिखरी हुई पार्टी बोलकर निशाना साध रही है. चुनावी राज्यों में इंडी वालों की अपनी ही लाइन बिखरी हुई दिखाई दे रही है.

देखिए दिल्ली में तो कॉकरोच और इंडी वालों का दांव नहीं चला. दो अक्टबूर को जो ये माहौल बनाने की कोशिश कर रहे थे. दिल्ली पुलिस ने सबको पकड़कर बाहर कर दिया. दिल्ली पुलिस के मुताबिक करीब एक हजार लोग हिरासत में लिया गया. सौरभ भारद्वाज, आतिशी, संजय सिंह, नेहा बोरा बस इसी माहौल का हिस्सा थे. तीन अक्टूबर को नेहा बोरा ने दोपहर एक बजे फिर से लोगों को जंतर मंतर बुलाया था, लेकिन पुलिस ने इन्हें पहुंचने नहीं दिया. तीन अक्टूबर को भी करीब 150 लोग हिरासत में लिए गए.

राहुल गांधी ने महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बदतमीजी का आरोप लगाया, लेकिन पुलिस ने इनके आरोपों को खारिज कर दिया. दिल्ली पुलिस ने इन्ही बवाल के चक्कर में तीन FIR दर्ज की. मतलब समझिए पहले दिन हजारों लोगों के साथ इन्होंने माहौल बनाया. दूसरे दिन इनके पास सौ-पचास लोग ही बचे. इन्होंने मोर्चा खोलने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने जगह ही नहीं खोलने दिया. इजाजत दोनों दिन नहीं मिली.

मुंबई में भी इन्होंने ऐसे ही माहौल बनाने की कोशिश की. अभीजीत दिपके ने तो ज्ञानेश कुमार के बहाने दिल्ली पुलिस और प्रधानमंत्री तक को टारगेट किया. अभिजीत दीपके ने मंबुई पुलिस की तारीफ की, लेकिन यहीं वो फंस गए. पहले तो पुलिस ने इनके प्रदर्शन के खिलाफ FIR दर्ज की और दूसरी तरफ इनके प्रदर्शन में नाबालिगों के इस्तेमाल को लेकर ही सवाल खड़े हो गए, जिसपर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया.

आरोप है कि एक बच्चे को भीड़ के ऊपर उठाया गया और भड़काऊ नारे लगे. ये भी आरोप है कि बच्चों को प्रदर्शन में लाने की बात पहले से ग्रुप चैट में हुई थी, ताकि नाबालिग को पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए ढाल बनाया जाए. शिकायत सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन के हेड ऑफ इंटरवेंशन सतीश वैद ने दाखिल की थी. शिकायत में सोशल मीडिया के फोटो और वीडियो का हवाला दिया गया.

अब राष्ट्रीय मानवाधिकार ने 7 दिन में रिपोर्ट मांगी है. सड़क पर इंडी वाले एक साथ माहौल बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन जहां असली परीक्षा है वहीं इनका लड़ाई लीक हो गई है. पंजाब में इंडी वालों की सिर्फ बॉन्डिंग नहीं टूटी है. ये कहीं भी एक मंच पर दिखने को भी तैयार नहीं है, लेकिन उससे बड़ी तस्वीर ये है कि पंजाब में कांग्रेस का अपना ही घर बिघरा हुआ दिखाई दे रहा है. सड़क पर जो लोग प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एकजुटता का दिखावा कर रहे हैं, उनका पंजाब वाला सिरा जुड़ा ही नहीं है.

अमरिंदर सिंह राजा वडिंग पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हट चुके हैं. हाईकमान ने बदलाव का फैसला किया. उसके बाद इस्तीफा आया. वडिंग अप्रैल 2022 से इस कुर्सी पर थे. उसी साल कांग्रेस सत्ता हारकर AAP के हाथ गई थी. अब 2027 का टेस्ट AAP के खिलाफ है, तो इस चुनाव से पहले ही पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष ने कुर्सी खाली कर दी है. पूर्व हॉकी कप्तान परगट सिंह को नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया.

उधर खबर है कि वडिंग और चरणजीत सिंह चन्नी खेमा भी बंटा हुआ है. चन्नी खेमा तो अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए भी खिलाफ था. पंजाब कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के खेमों के बीच की अंदरूनी कलह और मतभेद इतनी बढ़ी कि अक्टूबर 2026 के पहले हफ्ते में ही राजा वडिंग को पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा.

चरणजीत सिंह चन्नी का खेमा राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने के फैसले के सख्त खिलाफ था. दोनों गुटों के बीच जमीन पर वर्चस्व, पोस्टर्स और बयानों की लड़ाई पिछले कई महीनों से लगातार जारी थी. और पंजाब में ये लड़ाई सिर्फ दो चेहरों की नहीं है, बल्कि राजनीतिक रसूख की भी है. चन्नी पंजाब में दलित चेहरे के तौर पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं, जबकि राजा वडिंग जाट सिख राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं और यही लड़ाई देखकर कांग्रेस को बिखरी हुई पार्टी बताया जा रहा है. लेकिन बीजेपी तो पंजाब में आम आदमी पार्टी को भी बिखरी हुई पार्टी बता रही है.

अब देखिए जो कांग्रेस और आद आदमी पार्टी वाले ज्ञानेश कुमार को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल खड़े कर रहे हैं, वही पंजाब में आपस में एक दूसरे पर घेरने में लगे हैं. पंजाब कांग्रेस के नए अध्यक्ष परगट सिंह ने कैसे आम आदमी पार्टी को घेरना शुरू कर दिया.

कांग्रेस के मुताबिक पंजाब में आम आदमी पार्टी की वजह से कानून व्यवस्था हाल बुरा है. कांग्रेस ये भी दावा कर रही है कि पंजाब में वो सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी, जबकि उनकी अपनी ही पार्टी में गुटबाजी और अंदरूनी कलह और मतभेद की खबरें छन-छनकर बाहर आ रही है. 2022 में कांग्रेस पंजाब हार चुकी है. 2027 में वो चुनाव आम आदमी पार्टी के खिलाफ लड़ना चाहती है. लेकिन इनकी एक दिक्कत अंदरूनी कलह को दूर करने की है तो दूसरी लड़ाई इंडी वालों से ही है.

उधर यूपी में भी कांग्रेस को आइना इनके ही सहयोगी दिखा रहे हैं. समजवादी पार्टी ने तो कांग्रेस को यूपी में हैसियत याद दिला दी है. यूपी में कांग्रेस ने नेतृत्व में बदला किया है, लेकिन इसके साथ ही समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के फैसले पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. कांग्रेस ने आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष और सहारनपुर सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है, लेकिन अब यही गठबंधन में गांठ की वजह बन गई है.

सिर्फ समाजवादी पार्टी के नेता कांग्रेस पर सवाल नहीं खड़ी कर रहे हैं, बल्कि खुद अखिलेश यादव ने इसपर मजे ले लिए. क्योंकि जब इमरान मसूद ने गठबंधन पर समाजवादी पार्टी की गंभीरता पर सवाल उठाए. तो अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कह दिया कि हां- हम बिल्कुल भी गंभीर नहीं हैं.

अखिलेश यादव का जवाब भले ही छोटा था, लेकिन मैसेज क्लियर था. समाजवादी पार्टी कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं है. हालांकि कांग्रेस जरूर हुंकार भर रही है कि वो फ्रंट पर खेल रही है.

उधर कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद ने कहा कि INDIA गठबंधन कोई स्टेट लेवल का नहीं बल्कि नेशनल लेवल का अलायंस है. लेकिन कांग्रेस के बयान को लेकर समाजवादी पार्टी बिलकुल लोड लेने के मूड में नहीं दिखाई दे रही है। लेकिन कांग्रेस का प्लान है कि आराधना मिश्रा के जरिए कांग्रेस उत्तर प्रदेश के 9 फीसदी ब्राह्मण वोट और इमरान मसूद के जरिए प्रदेश के 20 फीसदी मुस्लिम वोट खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम वोटर्स को टारगेट करने की कोशिश कर रही है.

और कांग्रेस की यही रणनीति समाजवादी पार्टी को पंसद नहीं आ रही है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ने ढोरे डालने शुरू कर दिए हैं और दोनों के बीच तकरार भी इसी वोट बैंक को लेकर है. उत्तर प्रदेश में 20 फीसदी आबादी मुस्लिम है, जिनका 57 विधानसभा सीटों पर प्रभाव है. करीब 120 से 130 सीटों पर मुस्लिम वोटर जीत-हार का समीकरण बदल सकत हैं.

यही वजह है कि इमरान मसूद को यूपी कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने वाला फैसला समाजवादी पार्टी की आंखों में खटक रहा है. कुल मिलाकर चुनाव के पहले ही गठबंधन में तनाव साफ साफ दिखाई देने लगा है… NDA इसे इंडी वालों की वोट बैंक की मजूबरी बता रही है.

इंडी वाले सड़क पर एक साथ खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन लेकिन चुनावी जमीन पर इनकी तस्वीर बिलकुल उल्टी दिखाई दे रही है. दिल्ली और मुंबई में एक साथ प्रदर्शन हुआ, लेकिन पंजाब में कांग्रेस अपने ही अंदरूनी मतभेदों से जूझ रही है और यूपी में सहयोगी ही सीटों के हिसाब पर आमने-सामने हैं. यूपी में कांग्रेस ज्यादा सीटों की मांग कर रही है तो समाजवादी पार्टी अपनी तरफ से सीटों का हिसाब बता रही है. पंजाब में कांग्रेस और AAP के बीच भी सियासी दूरी साफ दिखाई दे रही है. यानी इंडी गठबंधन के सामने चुनौती सिर्फ बीजेपी को घेरने की नहीं है, बल्कि चुनाव से पहले गठबंधन के बीच सीट, नेतृत्व और रणनीति का तालमेल बैठाना भी बड़ी चुनौती है. सड़क पर एक मंच दिख सकता है, लेकिन चुनावी मैदान में हर पार्टी अपना हिस्सा चाहती है और यहीं इंडी वालों के एजेंडों की सारी परतों को बिखेर कर रख देता है.



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