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अकाल मृत्यु वाले पितरों को यहां मिलता है मोक्ष महाभारत से जुड़ी है मान्यता प्रेत पीपल की पूजा और तर्पण की परंपरा…


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अकाल मृत्यु वाले पितरों को यहां मिलता है मोक्ष, महाभारत से जुड़ी है मान्यता

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Pitru Paksha 2026 Pehowa Tirth: हरियाणा के पिहोवा तीर्थ में अकाल मृत्यु वाले पितरों को मोक्ष मिलता है. महाभारत काल से जुड़ी यह मान्यता है कि यहां प्रेत पीपल की पूजा और तर्पण करने से दिवंगत आत्माओं को शांति मिलती है. इस प्राचीन परंपरा के तहत, श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की मुक्ति के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं, जिससे उन्हें सद्गति प्राप्त हो सके.

अकाल मृत्यु वाले पितरों को यहां मिलता है मोक्ष, महाभारत से जुड़ी है मान्यताZoom

Pitru Paksha 2026 Pehowa Tirth: पितृपक्ष में अपने दिवंगत परिजनों को श्रद्धापूर्वक याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए देशभर में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जा रहे हैं. हरियाणा के पिहोवा तीर्थ का पितृकर्म की दृष्टि से विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. सरस्वती नदी के तट पर स्थित इस तीर्थ को मान्यताओं में ‘आदि गया तीर्थ’ कहा जाता है. यहां सालभर श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान के लिए पहुंचते हैं, लेकिन पितृपक्ष के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है.

अकाल मृत्यु वालों को मिलता है मोक्ष
पिहोवा में अकाल मृत्यु को प्राप्त लोगों की आत्मा की शांति और गति के लिए श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यता है कि जल, आकाश, पृथ्वी या अन्य किसी कारण से अकाल मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति के लिए यहां पितृकर्म करने से उसकी गति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है. इसी मान्यता के कारण पिहोवा में लोग अपने दिवंगत परिजनों के लिए विशेष रूप से पिंडदान कराने पहुंचते हैं. यहां आने वाले कई परिवार पीढ़ियों से अपने पारंपरिक पुरोहितों के पास श्राद्ध कर्म कराते आ रहे हैं.

महाभारत काल से जुड़ा है पिहोवा तीर्थ
पिहोवा तीर्थ को लेकर पौराणिक मान्यता महाभारत काल से जुड़ी हुई है. तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि महाभारत युद्ध में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर के हाथों सरस्वती तीर्थ पिहोवा में श्राद्ध और पिंडदान कराया गया था. मान्यता के अनुसार, पांडवों और कौरवों सहित युद्ध में मारे गए लोगों की गति के लिए यहां पितृकर्म किया गया. इसी कारण पिहोवा को पितरों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए विशेष तीर्थ माना जाता है.

प्रेत पीपल की पूजा और तर्पण की परंपरा
श्राद्ध और पिंडदान के बाद पिहोवा तीर्थ पर स्थित प्रेत पीपल की पूजा और तर्पण की भी परंपरा बताई जाती है. पुरोहितों के अनुसार, तर्पण का अर्थ पितरों की तृप्ति से है. पिंडदान के बाद तर्पण के लिए जल अर्पित किया जाता है और मान्यता के अनुसार यह जल प्रेत पीपल के माध्यम से पितरों तक पहुंचता है. पिंडदान में तिल, चावल, पुष्प और चावल के आटे सहित विभिन्न सामग्री का उपयोग किया जाता है. श्रद्धा से किए गए तर्पण और पिंडदान से पितरों की तृप्ति होती है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है.

पिशाच योनि में पड़े पितरों को मुक्ति
तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, पिहोवा में केवल पितृपक्ष ही नहीं, बल्कि चैत्र चौदस का भी विशेष महत्व है. इस अवसर पर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश सहित अन्य क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां पहुंचकर पिंडदान और तर्पण कराते हैं. पुरोहितों की मान्यता है कि चैत्र चौदस पर किए गए पिंडदान और तर्पण से पिशाच योनि में पड़े पितरों को भी मुक्ति मिल सकती है. उनका कहना है कि अगर किसी व्यक्ति का पिंडदान कहीं फलित नहीं हुआ हो तो पिहोवा में किए गए पिंडदान को फलदायी माना जाता है.

देशभर से यहां पहुंचते हैं लोग
तीर्थ पुरोहित ने बताया कि पिहोवा में श्राद्ध करने से सबसे महत्वपूर्ण रूप से मानसिक शांति मिलने की मान्यता है. अलग-अलग तीर्थों पर श्राद्ध के अलग-अलग धार्मिक महत्व बताए जाते हैं, लेकिन पिहोवा में किया गया पिंडदान मानसिक संतोष और शांति से जुड़ा माना जाता है. पितृपक्ष के दौरान पिहोवा में देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं.

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Parag SharmaChief Sub Editor

पराग शर्मा Hindi News18 Digital में Chief Sub Editor के पद पर कार्यरत हैं. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, ग्रह-नक्षत्र, राशि और वास्तु से जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं. भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेद…

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