Pitru Paksha 2026: आज से पितृ पक्ष की शुरुआत हो चुकी है. इस बार तिथि क्षय की वजह से 15 दिन में 16 तिथियों का श्राद्ध किया जाएगा, 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा. हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का विशेष समय माना जाता है. इस दौरान लोग अपने दिवंगत पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, भोजन अर्पण और दान-पुण्य जैसे कार्य करते हैं. महालया के इन दिनों में कई परिवार कुछ विशेष नियमों और परंपराओं का पालन करते हैं. ये नियम डर के उद्देश्य से नहीं बल्कि जीवन में सादगी, संयम और पूर्वजों के प्रति सम्मान बनाए रखने लिए हैं. इसलिए प्रतिपदा तिथि से सर्वपितृ अमावस्या तक कुछ चीजें ना करने की सलाह दी है. इन चीजों के करने से पितर नाराज हो सकते हैं और पितृदोष भी लग सकता है. आइए जानते हैं पितृपक्ष में कौन से काम भूलकर भी नहीं करने चाहिए…
पितृ पक्ष में बड़े मांगलिक कार्य शुरू ना करें
पितृ पक्ष को सामान्यतः पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध के लिए समर्पित समय माना जाता है. इसलिए इस अवधि में कई परिवार विवाह, सगाई, गृह प्रवेश और अन्य बड़े मांगलिक समारोह आयोजित करने से बचते हैं. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि रोजमर्रा के जरूरी काम रोक दिए जाएं. नौकरी, पढ़ाई, यात्रा और परिवार की सामान्य जिम्मेदारियां पहले की तरह निभाई जा सकती हैं. परंपरागत रूप से रोक मुख्य रूप से उन समारोहों पर मानी जाती है, जिनका उद्देश्य उत्सव और नए शुभ कार्य की शुरुआत करना होता है.
बिना जरूरत महंगी और विलासिता की चीजें खरीदने से बचें
पितृ पक्ष के दौरान कई परिवार नए कपड़े, आभूषण और अन्य महंगी या विलासिता की वस्तुओं की खरीदारी को टालना पसंद करते हैं. इसका संबंध सादगी और संयम की भावना से माना जाता है. हालांकि जरूरी सामान खरीदना अलग बात है. अगर काम, स्वास्थ्य, यात्रा या दैनिक जरूरत के लिए किसी वस्तु की आवश्यकता है, तो उसे खरीदने से जीवन को कठिन बनाने की जरूरत नहीं है. इस अवधि का मूल भाव दिखावे के बजाय सादगी और श्रद्धा है.
मांसाहार और शराब से रहें दूर
श्राद्ध पक्ष में कई परिवार सात्विक और सादा भोजन करते हैं. इस दौरान मांस, मछली, अंडे और शराब का सेवन न करने की परंपरा कई घरों में देखने को मिलती है. कुछ परिवार श्राद्ध के दिन प्याज और लहसुन का भी सेवन नहीं करते. श्राद्ध के भोजन में ताजगी, सादगी, शुद्धता और संयम को विशेष महत्व दिया जाता है. हालांकि खान-पान से जुड़े नियम अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में अलग हो सकते हैं.
भोजन को बिल्कुल भी बर्बाद ना करें
पितृपक्ष में भोजन का विशेष महत्व माना जाता है. श्राद्ध के दौरान पितरों के निमित्त भोजन बनाया जाता है और कई जगह ब्राह्मणों, जरूरतमंदों या अन्य लोगों को भोजन कराया जाता है. इसलिए इन दिनों भोजन की बर्बादी से बचना चाहिए. उतना ही भोजन लें जितना खा सकें और कोशिश करें कि भोजन जरूरतमंदों तक भी पहुंचे. पितृपक्ष को भोजन के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव विकसित करने के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है.
बेवजह पारिवारिक विवाद और झगड़ों से बचें
पितृपक्ष का संबंध परिवार और पूर्वजों की स्मृतियों से भी जुड़ा है. ऐसे में इन दिनों कटु वचन, अनावश्यक विवाद और पुराने झगड़ों को बढ़ाने से बचना बेहतर माना जाता है. परिवार में संपत्ति, विरासत और जिम्मेदारियों से जुड़े विवाद कई बार भावनात्मक हो सकते हैं. इसलिए हर पुराने मुद्दे को श्राद्ध के दिन उठाना जरूरी नहीं है. इसके बजाय दिवंगत परिजनों की अच्छी यादों को याद करना और परिवार में शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखना पितृ पक्ष की भावना के अधिक अनुरूप माना जाता है.
श्राद्ध के दिन बाल और नाखून काटने से बचें
कई हिंदू परंपराओं में श्राद्ध करने वाले व्यक्ति के लिए श्राद्ध के दिन बाल कटवाने, दाढ़ी बनाने और नाखून काटने से बचने की परंपरा है. हालांकि इस नियम को लेकर सभी परिवारों में एक जैसी मान्यता नहीं है. कहीं इसे केवल श्राद्ध की तिथि वाले दिन माना जाता है, तो कहीं कुछ लोग पूरी श्राद्ध अवधि में इसका पालन करते हैं. इसलिए इस मामले में अपने परिवार, क्षेत्र और कुल की परंपरा को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है.
पितृ पक्ष को अशुभ समय समझकर डरने की जरूरत नहीं
पितृ पक्ष के दौरान सबसे जरूरी बात यह है कि इन दिनों को लेकर अनावश्यक भय या अंधविश्वास ना पाला जाए. पितृ पक्ष का उद्देश्य यह नहीं है कि इन 16 दिनों में सामान्य जीवन रुक जाए या हर काम को अशुभ मान लिया जाए. लोग इस दौरान नौकरी करते हैं, पढ़ाई करते हैं, यात्रा करते हैं और अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारियां निभाते हैं. पितृ पक्ष का गहरा भाव पूर्वजों को याद करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उनके योगदान को सम्मान देना है.
आज से शुरू हुए पितृ पक्ष में रखें इन बातों का ध्यान
आज 27 सितंबर 2026 से पितृ पक्ष शुरू हो चुका है, जो 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा. इन दिनों में नियमों को लेकर अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में परंपराएं अलग हो सकती हैं. इसलिए पितृ पक्ष के दौरान अत्यधिक डर या कठोरता के बजाय सादगी, संयम, श्रद्धा, दान, तर्पण और पूर्वजों के सम्मान को महत्व देना चाहिए. आखिरकार श्राद्ध का मूल भाव यही है कि हम उन लोगों को याद करें, जिनकी वजह से हमारा वर्तमान अस्तित्व में आया है.
पितृपक्ष 2026 की प्रमुख श्राद्ध तिथियां
27 सितंबर, रविवार – प्रतिपदा श्राद्ध
28 सितंबर, सोमवार – द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर, मंगलवार – तृतीया श्राद्ध, महाभरणी
30 सितंबर, बुधवार – चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध
1 अक्टूबर, गुरुवार – षष्ठी श्राद्ध
2 अक्टूबर, शुक्रवार – सप्तमी श्राद्ध
3 अक्टूबर, शनिवार – अष्टमी श्राद्ध
4 अक्टूबर, रविवार – नवमी श्राद्ध
5 अक्टूबर, सोमवार – दशमी श्राद्ध
6 अक्टूबर, मंगलवार – एकादशी श्राद्ध
7 अक्टूबर, बुधवार – द्वादशी और मघा श्राद्ध
8 अक्टूबर, गुरुवार – त्रयोदशी श्राद्ध
9 अक्टूबर, शुक्रवार – चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्टूबर, शनिवार – सर्वपितृ अमावस्या