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इंसानी जिंदगी कितनी नाजुक लॉ क्लर्क की मौत पर भावुक हो गए सुप्रीम कोर्ट के जज फैसले से दी श्रद्धांजलि…


सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक ऐसा फैसला सुनाया गया, जो अपने कानूनी निष्कर्ष से कहीं ज्यादा भावनात्मक वजह से चर्चा में आ गया. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने दिवंगत लॉ क्लर्क-कम-रिसर्च एसोसिएट रित्विक देसवाल की याद में अपना फैसला समर्पित किया. रित्विक का निधन उनके 27वें जन्मदिन से महज चार दिन पहले हो गया था. जिस मामले पर फैसला सुनाया गया, उसकी रिसर्च और तैयारी में रित्विक ने अहम भूमिका निभाई थी.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, फैसला सुनाते हुए बेंच ने कहा कि इंसानी जिंदगी बेहद नाजुक है, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में हम अक्सर इसकी क्षणभंगुरता को महसूस नहीं कर पाते. जब जिंदगी अचानक अपनी नश्वरता का एहसास कराती है, तब तक कई बार बहुत देर हो चुकी होती है. इसी भाव के साथ पीठ ने अपने फैसले की शुरुआत की.

‘आज उनका जन्मदिन होता…’

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि रित्विक देसवाल उनके ऑफिस में लॉ क्लर्क-कम-रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम करते थे और उनके निधन ने गहरा खालीपन पैदा कर दिया है. बेंच ने कहा कि रित्विक अपने 27वें जन्मदिन से केवल चार दिन पहले इस दुनिया से चले गए, जबकि फैसले सुनाए जाने वाले दिन उनका जन्मदिन था.

बेंच ने कहा कि इस फैसले पर रित्विक के अंतिम शोध कार्य की ‘शांत लेकिन अमिट छाप’ मौजूद है. पीठ ने फैसले की तैयारी में उनके योगदान के लिए गहरी सराहना दर्ज की.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रित्विक अपने अंतिम समय में भी सत्य की खोज और न्याय की सेवा के प्रति समर्पित रहे. इसलिए यह फैसला उनकी स्मृति, उनकी ईमानदारी, कानून के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और अकादमिक जगत के प्रति उनके प्रेम को समर्पित किया जा रहा है.

‘उनकी कमी बेहद गहरी है’

बेंच ने रित्विक के असमय निधन को बेहद पीड़ादायक बताते हुए कहा कि उनकी मौत ने उनके जीवन में एक गहरी कमी पैदा कर दी है. अदालत ने उनके व्यक्तित्व और काम के प्रति सम्मान जताते हुए कहा कि यह फैसला उनके साथ अंतिम सहयोग के रूप में उनकी स्मृति को समर्पित किया जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट की ओर से किसी फैसले को इस तरह अपने दिवंगत लॉ क्लर्क को समर्पित किया जाना बेहद दुर्लभ भावनात्मक क्षण माना जा रहा है.

NSA के तहत हिरासत पर कोर्ट का अहम फैसला

जिस मामले में यह फैसला सुनाया गया, वह राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत एक व्यक्ति की हिरासत से जुड़ा था. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि पुलिस अधिकारी के सामने आरोपी की ओर से दिया गया इकबालिया बयान NSA के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने का आधार नहीं बन सकता.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि निवारक हिरासत हमेशा से एक असाधारण उपाय रही है. इसलिए इसका इस्तेमाल बेहद सावधानी के साथ और केवल उन दुर्लभ परिस्थितियों में किया जाना चाहिए, जहां ऐसा कदम वास्तव में जरूरी हो.

यूपी सरकार पर 10 लाख का जुर्माना

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की हिरासत को गैरकानूनी माना और उसे रद्द करने का आदेश दिया. अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत भी लगाई.

इस तरह मंगलवार का फैसला एक तरफ NSA के तहत हिरासत के कानूनी दायरे को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी लेकर आया, तो दूसरी तरफ यह सुप्रीम कोर्ट के एक युवा सहयोगी रित्विक देसवाल की स्मृति में दर्ज एक भावुक श्रद्धांजलि बन गया.



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