Chronovissor

--:--:-- -- ... | ... |
भारतन्यूज़ - Header

कोख से कोठे तक का खौफनाक सफर पिता ही ढूंढते थे मां के लिए ग्राहक अब साल की उम्र में हो रही बेटियों…


होमताजा खबरदेश

पिता ढूंढते थे मां के लिए ग्राहक, अब 7 साल की उम्र में हो रही बेटियों की सगाई!

Last Updated:

गुजरात के वाडिया गांव की कहानी किसी की भी रूह कंपा देगी. यहां पीढ़ियों से चली आ रही दर्दनाक परंपरा के तहत मां की कोख से लेकर कोठे तक का खौफनाक सफर तय होता है. यहां पिता ही अपनी घर की औरतों के लिए ग्राहक तलाशते थे. इस भयानक दलदल और नर्क से अपनी मासूम बेटियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए अब माता-पिता ने एक अजीब रास्ता चुन लिया है. महज सात साल की उम्र में बेटियों की सगाई की जा रही है. जानिए कैसे यह चौंकाने वाला कदम इन बच्चियों के लिए एक नया और सुरक्षित भविष्य लिख रहा है.

पिता ढूंढते थे मां के लिए ग्राहक, अब 7 साल की उम्र में हो रही बेटियों की सगाई!Zoom

गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित वाडिया गांव की दर्दनाक सच्चाई जहां बच्चियों को देह व्यापार के दलदल से बचाने के लिए कम उम्र में ही उनकी सगाई तय की जा रही है. (एआई इमेज)

अहमदाबाद से करीब दो सौ किलोमीटर दूर गुजरात का वाडिया गांव आज भी एक ऐसी खौफनाक और दर्दनाक कहानी बयां कर रहा है, जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए. यह कहानी है उस दलदल की है, जहां एक मां की कोख से लेकर कोठे तक का सफर तय होता है. यहां हालात ऐसे हैं कि जो पिता अपनी बेटी के सिर पर साया बनकर उसे दुनिया दिखाते हैं, वही पिता अपनी ही पत्नी और घर की औरतों के लिए ग्राहकों की तलाश करते थे. लेकिन अब इस खौफनाक जाल से अपनी बेटियों को बचाने के लिए माता-पिता ने एक ऐसा अजीब रास्ता चुन लिया है, जिसके बारे में जानकर आप सन्न रह जाएंगे. अब यहां महज सात साल की उम्र में मासूम बेटियों की सगाई की जा रही है.

पीढ़ियों पुराना दलदल और मजबूरी की जिंदगी

  • बनासकांठा जिले के इस छोटे से गांव की आबादी करीब साढ़े सात सौ लोगों की है. यहां की फिजाओं में आज भी एक अजीब सा डर घुला हुआ है. सदियों से घुमंतू समुदाय से ताल्लुक रखने वाले इस गांव में महिलाओं को जबरन देह व्यापार के दलदल में धकेला जाता रहा है.
  • हर सुबह इस गांव के कुछ पुरुष पालनपुर-थराद हाईवे पर जाते हैं. वे वहां किसी अच्छी जॉब या काम की तलाश में नहीं, बल्कि ट्रक ड्राइवर्स और राहगीरों को अपनी ही घर की महिलाओं के लिए ग्राहक के तौर में फंसाने जाते हैं. गरीबी और भुखमरी की वजह से यह सब यहां एक नॉर्मल सिस्टम बन चुका था.
  • यहां तक कि कई लड़कियों को यह भी नहीं पता होता कि जिस शख्स को वे अपना पिता मान रही हैं, क्या वही उनके असली बायोलॉजिकल फादर हैं या नहीं. पीढ़ियों से चली आ रही इस प्रथा ने न जाने कितनी जिंदगियों को बर्बाद कर दिया है.
इस गांव में घर के पुरुष ही अपनी पत्‍नी के लिए ग्राहक खोजते हैं. (एआई इमेज)

खौफ से बचने के लिए बचपन में ही ‘सगाई’ का कवच

  • भारत में भले ही बाल विवाह कानूनी तौर पर बैन है, लेकिन वाडिया गांव में रहने वाली सात से बारह साल की उम्र में बेटियों की सगाई किसी वरदान या सुरक्षा कवच से कम नहीं है. गांव में एक अनकहा रूल बन चुका है कि जिस लड़की की सगाई या शादी तय हो जाती है, उसे इस गंदे दलदल से दूर रखा जाता है.
  • यानी, एक कुप्रथा से अपनी बेटी को बचाने के लिए परिवारों को मजबूरी में दूसरी सामाजिक बुराई का सहारा लेना पड़ रहा है. इस दर्द से बाहर निकली 19 साल की एक युवती की कहानी दिल को झकझोर देने वाली है. उसकी मां और दादी इसी दलदल का हिस्सा थीं. लेकिन उसकी मां ने ठान लिया था कि वह अपनी बेटी की जिंदगी इस नर्क में बर्बाद नहीं होने देंगी.
  • उस लड़की की महज ग्यारह साल की उम्र में सगाई कर दी गई और अठारह साल की होते-होते उसकी शादी हो गई. आज वह गांव से दूर एक कॉलेज में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही है और एक डिगनिटी वाली लाइफ जी रही है. इसी तरह, एक महिला, जिसे खुद महज पंद्रह साल की उम्र में इस दुनिया में धकेल दिया गया था. उसने भी अपनी बेटी की बारह साल की उम्र में सगाई कर दी ताकि उसका अतीत उसकी बेटी का भविष्‍य पर भारी न पड़ जाए.
गुजरात के इस गांव में छोटी-छोटी बच्‍च‍ियों की सगाई हो रही है. (एआई इमेज)

बदलाव की किरण और उम्मीद की नई सुबह

साल 2012 में वाडिया गांव में बदलाव की एक छोटी सी रोशनी दिखाई दी. कुछ एनजीओ और सोशल वर्कर्स ने आगे आकर लोगों को समझाया. ‘विचरता समुदाय समर्थन मंच’ (VSSM) की फाउंडर मित्तल पटेल ने इन परिवारों को काउंसिल किया और समझाया कि वे अपनी बेटियों को इस रास्ते पर न भेजें. इसके बाद गांव में पहली बार सामूहिक विवाह का दौर शुरू हुआ. आज हर साल यहां ऐसे समारोह होते हैं. हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि कम उम्र में सगाई कराना भी पूरी तरह सही नहीं है, लेकिन इस गंदे और भयानक दलदल में धकेले जाने से तो यह कई गुना बेहतर है.

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि सरानिया समुदाय कभी मेवाड़ के महाराणा प्रताप की सेना के साथ चलता था. तब पुरुष तलवार और ढाल की धार तेज करते थे और महिलाएं सैनिकों का मनोरंजन करती थीं. लेकिन देश की आजादी के बाद जब रोजी-रोटी का संकट आया, तो इस समुदाय ने इस रास्ते को अपना लिया. आज भले ही वाडिया गांव धीरे-धीरे ही सही, लेकिन एक ब्राइट और सेफ फ्यूचर की तरफ कदम बढ़ा रहा है, पर अतीत के काले साये आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं. इस खौफनाक दलदल से निकलकर आज वाडिया की बेटियां स्कूल और कॉलेज जा रही हैं, जो इस बात का सबूत है कि थोड़ी सी हिम्मत और सही सपोर्ट से कोख से कोठे तक के इस भयानक सफर को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है.

About the Author

अनूप कुमार मिश्रAssistant Editor

Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…

और पढ़ें



Source link

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

🏠
Home
🎬
मनोरंजन
💰
धन
🌦️
मौसम
📢
Latest News
×
Scroll to Top