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जज साहब हम मझधार में अटक गए सूर्यकांत से बोले कपिल सिब् बल शिवसेना केस में सुप्रीम कोर्ट में बहस…


नई दिल्ली. शिवसेना नाम और चुनाव चिह्न धनुष-बाण विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर तीखी और जोरदार बहस देखने को मिली. भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष उद्धव ठाकरे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और क्षेत्राधिकार पर गंभीर सवाल खड़े किए. बहस के दौरान सिब्बल ने संस्थागत अखंडता को लोकतंत्र की बुनियाद बताते हुए कहा, “दलबदल एक संवैधानिक पाप है लेकिन अब दुर्भाग्य से यह सम्मान का प्रतीक बन गया है.” उन्होंने दलील दी कि अगर देश की संवैधानिक संस्थाओं पर ही जनता का भरोसा नहीं रहेगा तो लोकतंत्र में ऐसी ही अराजक स्थितियां उत्पन्न होंगी.

‘किस कानून के तहत छीना सिंबल?
सुप्रीम कोर्ट में तारीखों की पूरी क्रोनोलॉजी रखते हुए कपिल सिब्बल ने 26 जुलाई 2022 की बैठक का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि एकनाथ शिंदे की अध्यक्षता में हुई बैठक के मिनट्स के आधार पर 2018 के पार्टी संविधान को ही खारिज कर दिया गया. सिब्बल ने सवाल उठाया कि जब दोनों ही पक्ष उद्धव और शिंदे गुट यह स्वीकार कर चुके थे कि वे 2018 के संविधान के तहत काम कर रहे हैं तो चुनाव आयोग ने किस अधिकार क्षेत्र के तहत उस संविधान को खारिज किया?

सिब्बल ने ECI द्वारा 17 फरवरी 2023 को दिए गए फैसले को अनुचित बताते हुए कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों के अनुसार चुनाव आयोग के पास निर्णय लेने की सीमित शक्तियां हैं. उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उद्धव ठाकरे के पास 160 सदस्यों का स्पष्ट समर्थन था जबकि दूसरे पक्ष के पास शून्य था. इसके बावजूद चुनाव आयोग ने सिर्फ विधायिका दल में बंटवारे को पूरी पार्टी का बंटवारा मान लिया जो कानूनी रूप से सरासर गलत है.” सिब्बल ने इसके समर्थन में केरल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के पुराने मामलों का हवाला भी दिया.

‘हम मझधार में अटक गए’
बहस के दौरान सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी पुरानी दलीलों की याद दिलाते हुए कहा कि अगर आप अयोग्यता याचिका पर फैसला करने से पहले सिंबल के मुद्दे पर फैसला देंगे तो कानूनी समस्या खड़ी होगी ही. उन्होंने कहा, “संविधान पीठ ने पहले मेरी यह दलील खारिज कर दी थी, जिसके कारण आज हम मझधार में रह गए हैं. सरकार गैर-कानूनी तरीके से बनी और हमारा चुनाव चिह्न छीन लिया गया.”

‘तथ्य जुड़े हैं, लेकिन प्रक्रिया अलग’
कपिल सिब्बल की इन तीखी दलीलों पर सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत के साथ मौजूद जस्टिस बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि दोनों मुद्दे और तथ्य निश्चित रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं लेकिन अयोग्यता के लिए विधानसभा अध्यक्ष स्पीकर द्वारा की जाने वाली जांच एक पूरी तरह से अलग कानूनी प्रक्रिया है. ट्रिब्यूनल को यह तय करना होता है कि क्या किसी सदस्य ने स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ी है या नहीं. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना सीधे तौर पर पार्टी से संबंध तोड़ना नहीं माना जा सकता, हालांकि कोर्ट ने कहा कि यह कोई अंतिम कानूनी टिप्पणी नहीं है.

RP एक्ट और संस्थागत अखंडता पर हमला
सिब्बल ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) की धारा 29A और सिंबल ऑर्डर का हवाला देते हुए कहा कि हमारे कानून में केवल विधायिका दल के आधार पर असली पार्टी तय करने की कोई अवधारणा ही नहीं है. दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के पैरा 3 और पैरा 4 की गलत व्याख्या करके असंतुष्टों को सुरक्षित रास्ता देने की कोशिश की जा रही है. दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद CJI सूर्यकांत की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए मंगलवार या बुधवार का दिन तय किया है. अदालत के रुख और सिब्बल के आक्रामक तेवरों से साफ है कि आने वाले दिनों में यह कानूनी लड़ाई और दिलचस्प होने वाली है.

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना सिंबल विवाद की सुनवाई किस पीठ के सामने हो रही है?
इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ कर रही है.

कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग (ECI) के फैसले पर क्या मुख्य आपत्ति जताई?
सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग के पास 2018 के पार्टी संविधान को खारिज करने का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं था और आयोग ने विधायिका दल के बंटवारे को पूरी पार्टी का बंटवारा मानकर गलत फैसला दिया.

शिवसेना सिंबल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई कब होगी?
इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई अगले सप्ताह मंगलवार या बुधवार को होगी.



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