इंडिया गेट में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आदमकद मूर्ति को नमन करते हुए जब आप एपीजे अब्दुल कलाम मार्ग (पूर्व औरंगजेब रोड) पर मोहम्मद अली जिन्ना के 10 नंबर बंगले के आगे से गुजरते हैं, तो एक सवाल मन में उठता है कि क्या नेताजी जीवित होते तो भारत का विभाजन होता? हालांकि उनके जीवनकाल में ही अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित कर दिया था.
23 मार्च 1940 को लाहौर के मिन्टो पार्क (अब इकबाल पार्क) में जिन्ना ने दो घंटे के आक्रामक भाषण में हिंदू-मुस्लिम एकता को खारिज करते हुए कहा था कि ‘हिंदू और मुसलमान दो अलग धर्म हैं. दोनों के विचार, परंपराएं, इतिहास और नायक अलग हैं. इसलिए दोनों कतई साथ नहीं रह सकते.’ उन्होंने लाला लाजपत राय से लेकर चितरंजन दास तक को अपशब्द कहे. नेताजी ने निश्चित रूप से इस भाषण के अंश पढ़े होंगे.
पाकिस्तानी लेखक फारूक अहमद डार अपनी किताब जिन्नाज़ पाकिस्तान: फॉर्मेशन एंड चैलेंजेज़ ऑफ़ अ स्टेट में लिखते हैं कि मुस्लिम लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव के बाद कांग्रेस ने जिन्ना को रोकने की कोशिश की. जून 1940 में कांग्रेस अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस ने जिन्ना को स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया, शर्त यह थी कि वे विभाजन की मांग वापस ले लें. कुछ महीने बाद सी. राजगोपालाचारी ने मुस्लिम लीग को प्रधानमंत्री नामित करने और अपनी पसंद की कैबिनेट बनाने का अधिकार तक देने की पेशकश की. अप्रैल 1947 में गांधी जी ने भी विभाजन छोड़ने की शर्त पर जिन्ना को सत्ता सौंपने की बात कही. जिन्ना ने इन सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया. उनका लक्ष्य स्पष्ट था-अलग मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान.
नेताजी के प्रस्ताव पर सकारात्मक जवाब न मिलने के बाद वे पेशावर मार्ग से देश छोड़कर अंग्रेजों से मुक्ति की लड़ाई लड़ने निकल पड़े. जर्मनी से जापान तक की लंबी पनडुब्बी यात्रा के बाद उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया. उस फौज में मुसलमानों की भारी संख्या थी. आबिद हसन सफरानी उनके सचिव और दुभाषिया बने; उन्होंने ही ‘जय हिंद’ नारा गढ़ा. कर्नल हबीब उर रहमान, मेजर जनरल शाहनवाज खान, कर्नल शौकत अली मलिक, कर्नल महबूब अहमद, करीम गनी, डीएम खान और एहसान कादिर जैसे सैकड़ों मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी आजाद हिंद फौज और सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे. नेताजी ने सांप्रदायिक सद्भाव परिषद भी बनाई. आजाद हिंद फौज धर्मनिरपेक्षता की मिसाल थी. हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई एक साथ भारत की आज़ादी के लिए लड़े.
1938 में ही नेताजी और जिन्ना के बीच पत्र व्यवहार हो चुका था. 25 जुलाई 1938 को नेताजी ने जिन्ना को लिखा था कि अखिल भारतीय मुस्लिम लीग घोर सांप्रदायिक संगठन है और इसमें सिर्फ मुसलमानों को सदस्यता मिल सकती है. जिन्ना का जवाब तल्ख था, ‘मुस्लिम लीग भारत के मुसलमानों की एकमात्र सियासी जमात है. उसे कांग्रेस से किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं.’ नेताजी शायद उस समय यह नहीं समझ पाए थे कि लीग का सपना मात्र सात साल में साकार हो जाएगा.
अब सोचिए, अगर नेताजी जीवित होते तो 16 अगस्त 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे पर उनकी प्रतिक्रिया कैसी होती? जिन्ना ने उस दिन हिंदुओं के खिलाफ खुली हिंसा का आह्वान किया था. बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार ने दंगाइयों का साथ दिया. कोलकाता में पाँच हजार मासूम हिंदू मारे गए, जिनमें उड़िया मजदूर सबसे ज्यादा थे. हिंसा पूर्वी बंगाल, रावलपिंडी और नोआखाली तक फैल गई. जिन्ना ने कभी इन दंगों को रोकने की अपील तक नहीं की, न ही किसी दंगाग्रस्त क्षेत्र का दौरा किया. नेताजी कोलकाता के 1930 के मेयर रह चुके थे. वे जिन्ना और मुस्लिम लीग के गुंडों का सड़कों पर मुकाबला करते. वे जुझारू नेता थे, घर बैठकर हालात देखने वाले नहीं.
नेताजी की शख्सियत चमत्कारी और धर्मनिरपेक्ष थी. विभाजन का सबसे बड़ा असर बंगाल और पंजाब पर पड़ा-दोनों उनके प्रभाव वाले क्षेत्र थे. बंगाल उनका गृह प्रदेश था. पंजाब में नामधारी सिख उन्हें आदरणीय मानते थे और आज भी मानते हैं. मुसलमान और सिख दोनों उन्हें अपना नायक स्वीकार करते थे. जिन्ना का दावा कि सिर्फ मुस्लिम लीग ही मुसलमानों की राजनीतिक नुमाइंदगी करती है, नेताजी के प्रभाव के सामने गलत साबित होता.
अफसोस कि नेताजी 18 अगस्त 1945 को विमान हादसे में दुनिया से विदा हो चुके थे (या कम से कम आधिकारिक रूप से यही माना जाता है). अगर वे जीवित रहते तो संभवतः देश विभाजित ही न होता. उनकी उपस्थिति राजनीतिक समीकरण बदल सकती थी. इतिहास ‘अगर’ पर नहीं चलता, लेकिन नेताजी की विरासत हमें याद दिलाती है कि धर्मनिरपेक्ष एकता और जुझारू राष्ट्रवाद कितना शक्तिशाली हो सकता था.
विवेक शुक्ला की शीघ्र प्रकाशित पुस्तक ‘1947- विभाजन के शेष सवाल’ के अंश.
विवेक शुक्लापत्रकार और इतिहासकार
विवेक शुक्ला पत्रकार और इतिहासकार हैं. वे Gandhi ‘s Delhi और दिल्ली का पहला प्यार Connaught Place के लेखक है. वे दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के एडवाइजर रहे हैं. हिंदी और अंग्रेजी दोनो भाषाओं में लिखने वाले विवेक शुक्ला नामचीन मीडिया समूहों में काम करने के बाद अब नियमित तौर पर अलग-अलग प्लेटफार्म्स पर छपते हैं.
