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Gulab Lachhe Special Mithai: गुलाब लच्छे सिर्फ बच्चों की पसंद नहीं हैं, बल्कि यह मिठाई बड़े-बुजुर्गों के लिए भी यादों का खजाना है. लोग बताते हैं कि बचपन में वे इसी मिठाई का स्वाद लिया करते थे और आज भी इसे देखकर पुराने दिन याद आ जाते हैं. यही कारण है कि पीढ़ियां बदलने के बावजूद इस मिठाई की लोकप्रियता बरकरार है.
बदलते दौर में जहां नई-नई मिठाइयों और चॉकलेट्स का क्रेज बाजार तेजी से बढ़ रहा है, वहीं एक ऐसी पारंपरिक मिठाई आज भी बच्चों और बड़ों के दिलों पर राज कर रही है, जिसे देखते ही हर किसी का मन उसे खाने का हो जाता है. खास बात यह है कि यह मिठाई न केवल बच्चों की सबसे पसंदीदा है, बल्कि बड़े-बुजुर्गों को भी अपने बचपन की मीठी यादें ताजा करा देती है.
इस खास मिठाई का नाम है गुलाब लच्छे, जिनके बारे में बच्चों के बीच आज भी एक मशहूर डायलॉग सुनने को मिलता है गुलाब लच्छे, खाने में अच्छे, 10 के दो, लपक कर लो. करौली में गुलाब लच्छे बच्चों की सबसे पसंदीदा मिठाइयों में शामिल हैं. रंग-बिरंगी और अनोखे आकार की यह मिठाई बच्चों को दूर से ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है. कई बच्चे तो इसे देखते ही खाने की जिद करने लगते हैं. स्थानीय बच्चों के बीच इस मिठाई को लेकर अलग ही उत्साह देखने को मिलता है और वे मजाक-मस्ती में अपने खास डायलॉग भी दोहराते हैं.
गुलाब लच्छे सिर्फ बच्चों की पसंद नहीं हैं, बल्कि यह मिठाई बड़े-बुजुर्गों के लिए भी यादों का खजाना है. लोग बताते हैं कि बचपन में वे इसी मिठाई का स्वाद लिया करते थे और आज भी इसे देखकर पुराने दिन याद आ जाते हैं. यही कारण है कि पीढ़ियां बदलने के बावजूद इस मिठाई की लोकप्रियता बरकरार है.
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आज के महंगाई के इस दौर में जहां छोटी-छोटी चीजों की कीमत भी बढ़ गई है, वहीं गुलाब लच्छे आज भी मात्र 5 रुपये में उपलब्ध हैं. यही वजह है कि यह मिठाई हर वर्ग के लोगों तक आसानी से पहुंच जाती है और बच्चों की पहली पसंद बनी हुई है.
गुलाब लच्छे बनाने वाले व्यापारी राजेश गुप्ता बताते हैं कि यह मिठाई बनाने की प्रक्रिया काफ़ी मेहनतभरी है. इसे गजक की तरह चाशनी को बार-बार खींचकर तैयार किया जाता है. सबसे पहले चाशनी बनाई जाती है, फिर उसमें भुना हुआ मैदा मिलाया जाता है. इसके बाद विशेष तरीके से खींचाई कर गुलाब लच्छों का आकार दिया जाता है. लगभग एक घंटे में करीब 100 गुलाब लच्छे तैयार हो जाते हैं.
समय चाहे कितना भी बदल जाए, लेकिन गुलाब लच्छों की मिठास आज भी बच्चों की मुस्कान और बड़ों की यादों में उसी तरह घुली हुई है, जैसे बरसों पहले हुआ करती थी. खासतौर से राजस्थान के करौली और ग्रामीण इलाकों में इस मिठाई का क्रेज आज भी बरकरार है.