नई दिल्ली. भारत और रूस की संयुक्त तकनीकी साझेदारी से बनी ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली को लेकर मलेशिया की दिलचस्पी अब खुलकर सामने आ गई है. मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने पुष्टि की है कि उनका देश ब्रह्मोस की संभावित खरीद को लेकर भारत के साथ शुरुआती बातचीत कर रहा है. हालांकि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है और आगे की तकनीकी तथा सैन्य समीक्षा मलेशिया की एयर फोर्स को करनी है.
पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 12 सितंबर से हुई, जब मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम नई दिल्ली पहुंचे. वह 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मलेशिया के पार्टनर कंट्री के रूप में शामिल होने आए थे. इसी दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक हुई. भारत सरकार के मुताबिक दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश, रक्षा और सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इकोनॉमी, ऊर्जा और कई दूसरे क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा की. दोनों देशों ने भारत-मलेशिया कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई. लेकिन इस मुलाकात के बाद जिस मुद्दे ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा, वह था ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम.
अनवर ने खुद दी बातचीत की जानकारी
13 सितंबर को अनवर इब्राहिम ने भारतीय मीडिया से बातचीत में पुष्टि की कि मलेशिया ब्रह्मोस को हासिल करने की संभावना पर विचार कर रहा है. उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी. हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि अंतिम फैसला राजनीतिक स्तर पर सीधे नहीं होगा. मलेशिया की एयर फोर्स और संबंधित विशेषज्ञ एजेंसियां इसकी तकनीकी जरूरत, क्षमता और उपयुक्तता का आकलन करेंगी. अनवर ने ब्रह्मोस को लेकर अपना समर्थन भी जताया और कहा कि भारत के साथ संबंध विश्वास पर आधारित हैं और वह इस रिश्ते को सभी क्षेत्रों में मजबूत करना चाहते हैं.
आखिर मलेशिया को ब्रह्मोस में दिलचस्पी क्यों?
ब्रह्मोस एक लॉन्ग-रेंज, रैमजेट-पावर्ड सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम है. इसकी खासियत यह है कि इसके अलग-अलग वर्जन जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च किए जा सकते हैं. मलेशिया के लिए इसकी दिलचस्पी का एक बड़ा पहलू दक्षिण चीन सागर भी है.
दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ मलेशिया के समुद्री दावे जुड़े हुए हैं. ऐसे में लंबी दूरी की आधुनिक मिसाइल क्षमता मलेशिया की डिटरेंस यानी संभावित हमले को रोकने की क्षमता को मजबूत करने के लिहाज से अहम मानी जा सकती है. विश्लेषकों के मुताबिक यदि मलेशिया ब्रह्मोस खरीदता है, तो उसे यह स्पष्ट करना होगा कि इस हथियार प्रणाली का उद्देश्य उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा क्षमता मजबूत करना है, किसी एक देश को निशाना बनाना नहीं.
चीन के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम?
यही वह बात है जहां ब्रह्मोस की संभावित खरीद सिर्फ भारत-मलेशिया रक्षा सहयोग से आगे निकल जाती है. दक्षिण चीन सागर में चीन और मलेशिया के दावे जुड़े हुए हैं. ऐसे में मलेशिया के पास अगर ज्यादा लंबी दूरी और आधुनिक स्ट्राइक क्षमता आती है, तो क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण पर इसका असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के साथ रक्षा सहयोग मलेशिया को अपनी सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाने का मौका देता है, लेकिन इससे चीन की चिंता बढ़ने की संभावना भी हो सकती है. यही वजह है कि मलेशिया के लिए इस डील का मैसेज बेहद अहम होगा.
अमेरिका से दूरी या विकल्प बढ़ाने की कोशिश
वहीं, इस डील के साथ यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या मलेशिया अमेरिका से दूरी बनाने की कोशिश कर रहा है, या फिर वह विकल्प की तलाश में है. विशेषज्ञों के अनुसार, कुआलालंपुर का मकसद अपनी विदेश और रक्षा नीति में विकल्पों की संख्या बढ़ाना है. मलेशिया अमेरिका, चीन और दूसरे देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए भारत के साथ भी रणनीतिक सहयोग बढ़ाना चाहता है. एक रक्षा विशेषज्ञ के अनुसार, भारत के साथ संबंध मजबूत करने का मतलब चीन या अमेरिका से दूरी बनाना नहीं है, बल्कि मलेशिया के आर्थिक और रणनीतिक विकल्पों का विस्तार करना है.
रक्षा के साथ आर्थिक रिश्ता भी बढ़ाने की कोशिश
अनवर इब्राहिम का भारत दौरा सिर्फ रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं था. ब्रिक्स सम्मेलन के बाद उन्होंने भारत में निवेश और दोनों देशों के बीच पूंजी प्रवाह बढ़ाने पर भी जोर दिया. मलेशिया और भारत के बीच आर्थिक रिश्ते अभी अमेरिका और चीन के मुकाबले काफी छोटे हैं. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 79.3 अरब मलेशियाई रिंगिट रहा, जबकि अमेरिका और चीन के साथ मलेशिया का संयुक्त व्यापार 900 अरब रिंगिट से अधिक था. ऐसे में कुआलालंपुर भारत को सिर्फ रक्षा सप्लायर के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक और रणनीतिक साझेदार के तौर पर भी देख रहा है.
2024 में बनी थी रणनीतिक नींव
भारत और मलेशिया के रिश्तों में पहले ही एक महत्वपूर्ण कदम उठ चुका है. दोनों देशों ने 2024 में कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को आगे बढ़ाने पर सहमति बनाई थी. अब रक्षा, निवेश, टेक्नोलॉजी और सुरक्षा सहयोग के अलग-अलग क्षेत्रों में इसे आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है. सितंबर 2026 की मोदी-अनवर बैठक में भी रक्षा और सुरक्षा के साथ कई दूसरे क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा हुई है. इस लिहाज से ब्रह्मोस बातचीत को दोनों देशों के बीच पहले से मजबूत होते रणनीतिक रिश्ते की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा सकता है.