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Kerala High Court rape verdict: केरल हाईकोर्ट ने नाबालिग के प्राइवेट पार्ट पर वाइब्रेटिंग मशीन जैसे डिवाइस को जबरन लगाने के मामले में इसे गंभीर यौन अपराध और रेप की श्रेणी में माना है. इस फैसले के बाद फरवरी 2026 का छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला भी चर्चा में आ गया, जिसमें बिना किसी अंग या वस्तु के निजी अंग में प्रवेश हुए केवल वीर्य निकलने को रेप नहीं माना गया था. दोनों फैसले पहली नजर में अलग दिखाई देते हैं, लेकिन इनके पीछे घटना के अलग-अलग तथ्य और निजी अंग में प्रवेश की कानूनी स्थिति अहम है. केरल मामले में डिवाइस के इस्तेमाल को प्रवेश माना गया, जबकि छत्तीसगढ़ मामले में अदालत ने प्रवेश नहीं होने को निर्णायक माना.
केरल हाईकोर्ट ने वाइब्रेटिंग डिवाइस के जरिए किए गए यौन कृत्य को रेप माना. (सांकेतिक फोटो)
Kerala High Court rape verdict: किसी महिला के शरीर के सबसे निजी हिस्से के साथ जबरदस्ती हुई हो और मामला अदालत तक पहुंचा हो तो सवाल सिर्फ अपराध की गंभीरता का नहीं रहता. सवाल यह भी होता है कि कानून उस कृत्य को किस श्रेणी में रखता है. केरल हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने इसी सवाल को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है. अदालत ने एक नाबालिग के प्राइवेट पार्ट पर वाइब्रेटिंग मशीन जैसे डिवाइस को जबरन लगाने के कृत्य को महज यौन उत्पीड़न नहीं माना. कोर्ट ने इसे POCSO के तहत यौन अपराध की गंभीर श्रेणी और IPC की धारा 375 के तहत बलात्कार की श्रेणी में माना. फैसला सख्त है और संदेश भी साफ है कि यौन हिंसा को सिर्फ इस आधार पर हल्का नहीं किया जा सकता कि अपराधी ने अपने शरीर के किसी अंग का इस्तेमाल नहीं किया.
लेकिन इसी फैसले के साथ फरवरी 2026 में आया छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का एक फैसला भी याद आता है. वहां अदालत ने कहा था कि बिना किसी अंग या वस्तु के महिला के निजी अंग में प्रवेश हुए सिर्फ वीर्य निकलने की स्थिति को IPC की धारा 375 के तहत बलात्कार नहीं माना जा सकता. उस मामले में आरोपी को रेप की बजाय रेप के प्रयास का दोषी माना गया और सजा भी उसी हिसाब से कम की गई. पहली नजर में दोनों फैसले विरोधाभासी लग सकते हैं. एक तरफ डिवाइस के इस्तेमाल को शरीर के निजी अंग में प्रवेश के बराबर माना गया, दूसरी तरफ बिना प्रवेश के यौन कृत्य को रेप नहीं माना गया. मगर असल फर्क घटना की कानूनी प्रकृति और शरीर के निजी अंग में प्रवेश हुआ या नहीं, इस सवाल पर है.
दो फैसले, एक बड़ा सवाल… आखिर रेप की कानूनी सीमा क्या है?
- केरल हाईकोर्ट का मामला त्रिशूर के आरोपी जोशी के. जे. से जुड़ा है. मामला 17 साल की नाबालिग से यौन हिंसा का था. ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बलात्कार और गंभीर यौन अपराधों के लिए 10 साल के सश्रम कारावास की सजा दी थी. आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन अदालत ने ट्रायल कोर्ट की सजा को बरकरार रखा.
- मामला 20 जुलाई 2019 की घटना से जुड़ा है. अभियोजन के मुताबिक, पीड़िता 12वीं की परीक्षा में असफल होने के बाद आगे पढ़ाई और नौकरी की तलाश कर रही थी. इसी दौरान उसे कॉस्मेटोलॉजी सिखाने और नौकरी दिलाने का झांसा देकर मनसून मावुंकल के घर बुलाया गया. आरोप है कि वहां आरोपी जोशी ने उसे ट्रीटमेंट रूम में जबरन लिटाया और एक वाइब्रेटिंग मशीन जैसे डिवाइस को उसके प्राइवेट पार्ट पर चालू हालत में जबरन लगाया. पीड़िता को चुप रहने की धमकी भी दी गई थी.
केरल HC ने क्यों माना इसे रेप?
केरल हाईकोर्ट के सामने सबसे अहम सवाल यही था कि इस तरह के डिवाइस के इस्तेमाल को कानून की नजर में कैसे देखा जाए. अदालत ने कृत्य की प्रकृति को देखते हुए इसे महज यौन उत्पीड़न मानने से इनकार किया. कोर्ट ने इसे POCSO के तहत गंभीर यौन अपराध और IPC की धारा 375 के तहत बलात्कार की श्रेणी में रखा.
यानी अदालत ने यह देखा कि किसी डिवाइस के जरिए पीड़िता के निजी अंग में जबरन किया गया कृत्य भी कानूनी तौर पर प्रवेश के दायरे में आ सकता है. इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि आरोपी ने अपने शरीर के किसी अंग से प्रवेश नहीं किया था. अपराध में इस्तेमाल किए गए डिवाइस की भूमिका भी कानूनी रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है.
अब छत्तीसगढ़ HC का फैसला क्यों आया याद?
फरवरी 2026 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के सामने बिल्कुल अलग तरह के तथ्य थे. मामला वासुदेव गोंड बनाम छत्तीसगढ़ राज्य का था. घटना 21 मई 2004 की थी और धमतरी जिले से जुड़ी थी. जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल जज बेंच ने 16 फरवरी 2026 को अपील पर फैसला सुनाया. अदालत ने आरोपी को बलात्कार के आरोप से राहत देते हुए उसे रेप के प्रयास का दोषी माना. कोर्ट ने कहा कि बिना किसी अंग या वस्तु के निजी अंग में प्रवेश हुए केवल वीर्य निकलने की स्थिति को IPC की धारा 375 के तहत बलात्कार नहीं माना जा सकता. ऐसी स्थिति में अपराध रेप के प्रयास के रूप में देखा जाएगा और IPC की धारा 376 के साथ धारा 511 के तहत दंडनीय होगा.
दोनों फैसलों में फर्क कहां है?
- यहीं पूरी कहानी का सबसे अहम कानूनी पेंच है. दोनों फैसलों को सिर्फ यह कहकर अलग-अलग नहीं समझा जा सकता कि एक कोर्ट ने रेप माना और दूसरे ने नहीं. असल सवाल यह है कि संबंधित मामले में शरीर के निजी अंग में किसी अंग या वस्तु का प्रवेश हुआ था या नहीं और कानून में उस कृत्य को किस तरह परिभाषित किया गया है.
- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मामले में अदालत ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर माना कि ऐसा प्रवेश नहीं हुआ था. इसलिए बलात्कार की कानूनी परिभाषा पूरी नहीं हुई और अपराध को रेप के प्रयास के रूप में देखा गया. दूसरी ओर केरल हाईकोर्ट के मामले में अदालत के सामने ऐसा कृत्य था जिसमें वाइब्रेटिंग डिवाइस को पीड़िता के योनि द्वार पर जबरन लगाया गया था. अदालत ने इसे प्रवेश के दायरे में माना. इसलिए वहां निष्कर्ष अलग निकला.
POCSO में नाबालिग होने से मामला और गंभीर
केरल का मामला इसलिए भी ज्यादा संवेदनशील है क्योंकि पीड़िता की उम्र 17 साल थी. नाबालिग से जुड़े यौन अपराधों में POCSO कानून लागू होता है. इस कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है और इसमें अलग-अलग प्रकार के यौन हमलों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है. इस मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की 10 साल की सजा को बरकरार रखा. अदालत का फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि किसी नाबालिग के साथ जबरदस्ती किए गए यौन कृत्य को केवल तकनीकी आधार पर हल्का नहीं माना जा सकता.
क्या दोनों हाईकोर्ट के फैसले आपस में टकराते हैं?
पहली नजर में दोनों फैसलों को पढ़ने पर ऐसा लग सकता है कि दोनों अदालतों की राय अलग है. लेकिन उपलब्ध तथ्यों को देखें तो दोनों फैसलों का आधार अलग है. छत्तीसगढ़ के मामले में निजी अंग में प्रवेश नहीं होने को निर्णायक माना गया. केरल के मामले में अदालत ने डिवाइस के जरिए किए गए कृत्य को निजी अंग में प्रवेश के रूप में देखा.
इसलिए इसे सीधे तौर पर दो हाईकोर्ट के बीच कानूनी टकराव कहना जल्दबाजी होगी. दोनों मामलों में घटना के तथ्य, पीड़िता की उम्र, लागू कानून और कृत्य की प्रकृति अलग है. यही अंतर अदालत के निष्कर्ष को भी बदल देता है.
कानून की एक लाइन, लेकिन मायने बहुत बड़े
रेप कानून में निजी अंग में प्रवेश की अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण है. अदालत को यह तय करना होता है कि किसी घटना में कानून में बताए गए जरूरी तत्व मौजूद हैं या नहीं. हर यौन हिंसा को एक ही कानूनी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. अपराध की प्रकृति और उसके तथ्यों के आधार पर धाराएं तय होती हैं.
यही वजह है कि केरल हाईकोर्ट के फैसले को केवल ‘वाइब्रेटिंग मशीन रखने’ वाली टिप्पणी के तौर पर देखना अधूरा होगा. असली बात यह है कि अदालत ने डिवाइस के जरिए किए गए जबरन यौन कृत्य को कानूनी रूप से निजी अंग में प्रवेश माना. वहीं छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिना प्रवेश वाले मामले में रेप की कानूनी परिभाषा लागू की और उसे रेप का प्रयास माना. दोनों फैसले यह दिखाते हैं कि यौन अपराधों में एक छोटा-सा तथ्य भी कानूनी नतीजा पूरी तरह बदल सकता है.
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सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 4 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह…
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