Main Khaki Hoon: पहले मोबाइल की लत, फिर फोकस की सीख, उसके बाद छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण, शहीदों का जिक्र और आखिर में ‘मैं खाकी हूं’ की भावुक पंक्तियां… नागपुर पुलिस कमिश्नर विश्वास नांगरे पाटिल की ये बातें किसी को भी झकझोरने के लिए काफी हैं. कारगिल दिवस के अवसर पर नागपुर के भोंसला मिलिट्री स्कूल में कही गई उनकी इन बातों के केंद्र में खासतौर पर जेन-जी थे. उनका कहना था कि अगर युवा अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाएं तो वे न सिर्फ खुद को बेहतर बना सकते हैं, बल्कि देश के लिए भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम मोबाइल पर जरूरत से ज्यादा बिजी हो गए हैं. जेन-जी से बात करना भी कई बार मुश्किल हो गया है. किसी का स्क्रीन टाइम 6 घंटे है, किसी का 7 घंटे. घंटों तक स्क्रॉलिंग चलती रहती है. उन्होंने कहा कि जिंदगी का नियम बहुत आसान है कि ‘अगर आप फोकस करेंगे, तो सीखेंगे. सीखेंगे, तो आगे बढ़ेंगे. आगे बढ़ेंगे, तभी जिंदगी का सही आनंद ले पाएंगे.’ लेकिन आज हो क्या रहा है. हमारा ब्रेन 5 सेकंड, 7 सेकंड में यहां से वहां और वहां से यहां जंप कर रहा है. लगातार बदलती स्क्रीन के बीच आखिर ब्रेन में क्या केमिकल लोचा होता है, किसी के लिए भी समझना मुमकिन नहीं है.
सोचिए हमारा क्या होगा?
नागपुर पुलिस कमिश्नर विश्वास नांगरे पाटिल ने आचार्य नारायण के हितोपदेश ग्रंथ का एक श्लोक भोंसला मिलिट्री स्कूल के बच्चों को सुनाया.
यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥
उन्होंने इसका अर्थ समझाते हुए कहा कि यौवन यानी जवानी. खासकर 16 से 18 साल की वह उम्र, जब हमारा प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स विकसित होता है. यही उम्र सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. उन्होंने कहा कि छत्रपति शिवराय ने महज 16वें साल में स्वराज्य की स्थापना की थी. इसके बाद उन्होंने श्लोक की दूसरी बातों की ओर इशारा करते हुए कहा कि प्रभुत्व यानी सत्ता और अविवेक. इनमें से एक भी चीज इंसान की जिंदगी खराब करने के लिए काफी है. अगर ये तीन-चार बातें एक साथ आ जाएं तो सोचिए हमारा क्या होगा?
जीवन में बहुत जरूरी है एडवर्सिटी कोशिएंट
उन्होंने कहा कि जिंदगी में सिर्फ इंटेलिजेंस कोशिएंट (आईक्यू) होना काफी नहीं है. उसके साथ इमोशनल कोशिएंट (ईक्यू) भी जरूरी है. सोशल कोशिएंट (एसक्यू) भी उतना ही जरूरी है. लेकिन सबसे अहम है एडवर्सिटी कोशिएंट (एक्यू). यानी कठिन परिस्थितियों में हम कितनी मजबूती से लड़ सकते हैं, यही असली परीक्षा होती है. यही बात समझाने के लिए उन्होंने देश के वॉर हीरोज का जिक्र किया. उन्होंने कैप्टन विक्रम बत्रा को याद करते हुए कहा कि एक पीक पर कब्जा करने के बाद भी उनका जज्बा ‘ये दिल मांगे मोर’ का था. यानी एक चोटी जीतने के बाद दूसरी चोटी भी चाहिए. उन्होंने लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे और कई अन्य वीर सैनिकों का जिक्र करते हुए कहा- ‘शहीदों की चिताओं पर हर बरस लगेंगे मेले,
वतन पे मर मिटने वालों का बाकी यही निशां होगा.’ उन्होंने कहा कि हम विजय दिवस इसलिए मनाते हैं ताकि इन शहीदों के आदर्श हमेशा हमारे सामने बने रहें.
आप कब बनते हैं सैनिक?
इसके बाद सीपी विश्वास नांगरे पाटिल पुलिस और सैनिक के जीवन की ओर मुड़ गए. उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारी होने की वजह से कई बार हम खुद को असहाय भी महसूस करते हैं. पुलिसकर्मी और सैनिक का जीवन बिल्कुल भी आसान नहीं होता है. उन्होंने सैनिक के जीवन को भावुक अंदाज में समझाते हुए कहा कि जब आपकी कलम आपकी राइफल बन जाती है, आपकी शर्ट आपकी वर्दी बन जाती है, आपके जूते आपके बूट बन जाते हैं, आपका शिक्षक आपका प्रशिक्षक बन जाता है, आपका प्रिंसिपल आपका कमांडेंट बन जाता है, प्रार्थना स्थल परेड ग्राउंड में बदल जाता है और सबसे बढ़कर, जब आपकी मां सिर्फ आपकी मां नहीं रह जाती, बल्कि ‘भारत माता’ बन जाती है, तब आप एक सैनिक बन जाते हैं. उन्होंने आगे कहा, उस पल देशभक्ति सिर्फ एक भावना नहीं रहती, बल्कि हमारे खून और हमारी त्वचा में बस जाती है. मेरे लिए वर्दी सिर्फ कपड़ा नहीं है, बल्कि मेरी त्वचा का हिस्सा है.’
जेन-जी की गालियों के जवाब में क्या बोले कमिश्नर
सीपी विश्वास नांगरे पाटिल ने कहा कि कई बार पुलिसिंग का काम थैंकलेस भी लगता है. कई बार गालियां भी मिलती हैं. पिछले सात-आठ दिनों से बहुत ज्यादा मिली है. लेकिन इसके बावजूद हमें काम करते रहना पड़ता है. इसके बाद उन्होंने अपनी भावुक कविता ‘मैं खाकी हूं’ भी सुनाई.
दिन हो, रात हो, सांझ हो, वाली बाती हूं, मैं खाकी हूं.
आंधी में, तूफान में, होली में, रमजान में,
देश के सम्मान में अडिग कर्तव्यों की अविचल परिपाटी हूं, मैं खाकी हूं.
तैयार हूं हमेशा ही तेज धूप और बारिश को हंसकर सहने को,
सारे त्योहार भीड़ के साथ मनाने को.
कभी पत्थर और कभी गाली भी खाने को,
मैं बनी दूजी माटी हूं, मैं खाकी हूं.
विघ्न-विकट सहकर भी सुशोभित, सज्जित भाती हूं.
मुस्काती हूं, इतराती हूं.
वर्दी में गौरव पाती हूं, मैं खाकी हूं.
तम में प्रकाश हूं, कठिन वक्त में आस हूं.
हर वक्त तुम्हारे पास हूं.
बुलाओ तो दौड़ी चली आती हूं, मैं खाकी हूं.
भूख और प्यास कहां…
मैं एक तिरंगे में लिपटी रोती-सिसकती छाती हूं,
मैं खाकी हूं.