‘मंगलवार को आ जाऊंगी… मैं तुम्हारा एक मंत्री से इंटरव्यू करवा दूंगी. सब कुछ तय हो गया है…’
शुक्रवार रात करीब 8 बजे जब मैंने पायल मेहता को फोन किया, तो वह बहुत उत्साहित लग रही थीं. वह अपने परिवार के साथ मुंबई में थीं, एक ऐसी यात्रा पर जिसका उन्हें लंबे समय से इंतजार था. वह खास तौर पर गणपति उत्सव के दौरान अपनी मां को मुंबई ले जाना चाहती थीं. हमने काम के बारे में बात की, जैसा कि हम अक्सर करते थे.
रविवार सुबह 5 बजे पल्लवी घोष ने मुझे एक ऐसी खबर के साथ जगाया जिस पर मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा है. पायल अब नहीं रहीं. मैंने पूरा दिन इस बात को स्वीकार करने की कोशिश में बिताया. मैं नाकाम रहा. कुछ लोग काम करने के लिए आते हैं. और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने काम से इस तरह जुड़ जाते हैं कि उनसे अलग नहीं किए जा सकते. पायल उन्हीं में से एक थीं.
एक धारणा है कि टेलीविज़न जर्नलिज़्म सिर्फ शोर-शराबे और सतही चीजो के बारे में है. लेकिन पायल मेहता जैसे लोगों ने हमें याद दिलाया कि टेलीविजन न्यूज बनाने में असल में क्या-क्या लगता है: लंबे घंटे, शारीरिक थकान, लगातार यात्रा और जब बाकी सब घर चले गए हों, तब भी काम में डटे रहने की इच्छाशक्ति. संसद में पायल को लेकर एक मजाक चलता था. जब सुबह ‘मकर द्वार’ खुलता था, तब वह वहां होती थीं, और जब रात में उसे बंद किया जाता था, तब भी वह वहीं होती थीं.
मुझे याद है, मैंने एक बार उनसे पूछा था, “तुम संसद में इतनी देर रात तक क्यों रहती हो? मैंने तो कभी तुम्हें रुकने के लिए नहीं कहा.” उनका जवाब बिना किसी हिचकिचाहट के आया, “मुझे कोई भी खबर मिस करना पसंद नहीं है. क्या पता कोई मंत्री किसी और को फ़ोन करके कुछ ‘ऑफ-रिकॉर्ड’ कह दे और हम उसे मिस कर दें?”
पायल ऐसी ही थीं. सुबह 8 बजे लाइव. अगर कहानी की जरूरत हो तो आधी रात को भी लाइव. उन्हें कभी किसी कहानी के पीछे भागने के लिए कहने की जरूरत नहीं पड़ती थी. वह कभी भी काम के सिलसिले में होने वाली यात्रा से पीछे नहीं हटती थीं. उन्हें जमीनी स्तर पर काम करना पसंद था, और चुनाव से जुड़े इंटरव्यू उनकी खासियत थी. वह हर मायने में एक रिपोर्टर थीं.
लेकिन हाल ही में, जिंदगी उसके लिए बहुत मुश्किल हो गई थी. पिछले महीने उसने अपने पिता को खो दिया. उस सुबह उसने मुझे फोन करके बताया कि वह कोलकाता जा रही है. उसे उसी दिन जापान में एक असाइनमेंट के लिए निकलना था. वह ट्रिप कभी नहीं हो पाई. इस महीने की शुरुआत में, दिल्ली में उसके पिता की याद में रखे गए एक कार्यक्रम में मैं पहली बार उसकी मां से मिला. पायल ने गर्व के साथ मेरा परिचय कराया, “मां, ये मेरे बॉस हैं… देखिए, ये आए हैं.”
आज, उस मां को अपने पति और अब अपनी बेटी को खोने का दुख सहना पड़ रहा है. ऐसे नुकसान के लिए कोई शब्द नहीं हैं. ज़िंदगी बहुत बेरहम हो सकती है. और बहुत नाज़ुक भी. मुझे जो बात हमेशा याद रहेगी, वह यह है कि शोक की छुट्टी से लौटने के बाद भी पायल काम पर वापस लौटने के लिए बहुत उत्सुक थी. उसने मुझे फोन करके कहा, “मैं घर से लाइव करने के लिए उपलब्ध हूं.”
इस हफ़्ते की शुरुआत में, वह ऑफ़िस आई और प्रधानमंत्री के जन्मदिन की कवरेज पर चर्चा करने के लिए मेरे साथ बैठी. मैंने पूछा, “वडनगर जाना है?” उसने तुरंत कहा कि वह जाना चाहती है. वह फिर से काम के बीच में लौटना चाहती थी. गुरुवार को उसने मुझे वडनगर से फोन किया. “मुझे अच्छा लग रहा है कि मैं ज़मीन से चैनल पर वापस लाइव कर रही हूं. यह जगह खास है. मुझे भेजने के लिए धन्यवाद.”
मुझे अभी भी उसकी ये बातें सुनाई देती हैं. पायल और मैं एक ही उम्र के थे. जब मैं लगभग तीन साल पहले CNN-NEWS18 में उसका रिपोर्टिंग मैनेजर बना, तो हम बहुत अलग-अलग तरह की पत्रकारिता की पृष्ठभूमि से आए थे. वह पूरी तरह से टेलीविजन पत्रकार थी. मैं अखबार का शौकीन था. हमारे बीच मतभेद थे. हमने बहस की. हम असहमत हुए. कभी-कभी, हमने एक-दूसरे को बहुत परेशान भी किया. लेकिन कहीं न कहीं, हमारे बीच एक-दूसरे के लिए सम्मान पैदा हो गया. और पेशेवर मतभेदों के बावजूद, हम दोनों समझते थे कि हम दोनों को अपने काम की बहुत परवाह है.
यह समझ 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान साफ़ तौर पर दिखी. पायल और मैंने वित्त मंत्री और फिर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के इंटरव्यू के लिए साथ काम किया. दिल्ली में वित्त मंत्री का इंटरव्यू लेने के बाद, हम उसी दिन नड्डा का इंटरव्यू लेने के लिए बिलासपुर गए. बाद में, पायल ने मेरी तरफ देखकर कहा, “यार अमन, अब तुझे टीवी समझ आने लगा है.” मैं हंस पड़ा. यह उसके कहने का एक तरीका था कि शायद अखबार वाला अब आखिरकार टेलीविजन का काम-काज सीख रहा था. लेकिन शायद चेतावनी के संकेत पहले ही मिल चुके थे.
2024 में, जब हम वाराणसी में प्रधानमंत्री के रोड शो की कवरेज कर रहे थे, तो पायल BHU के पास शुरुआती पॉइंट पर तैनात थीं. मैं दूसरे छोर पर, काशी विश्वनाथ के पास था. अचानक, हमारे वीडियो जर्नलिस्ट ने मुझे फोन किया. पायल कुछ देर के लिए बेहोश हो गई थीं और वह उन्हें वापस होटल ले जा रहे थे. जब मैंने बाद में होटल में उनका हाल-चाल पूछा, तो उन्होंने इसे गर्मी की वजह से हुई थकान बताकर टाल दिया.
असल में बात कुछ और थी. कुछ दिनों बाद, उन्हें घर पर ही ‘मिनी-स्ट्रोक’ आया. उनके दोस्त हिमांशु, जो ‘आज तक’ में काम करते हैं, उन्हें तुरंत नोएडा के कैलाश अस्पताल ले गए. अगली सुबह मैं उनसे मिलने गया. डॉक्टरों ने पाया कि उनके हेल्थ पैरामीटर्स (स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े) काफी बिगड़े हुए थे. वे उन्हें कुछ दिनों तक निगरानी में रखना चाहते थे.
पायल परेशान थीं. सिर्फ इसलिए नहीं कि क्या हुआ था, बल्कि इसलिए भी कि यह सब किस समय हुआ. चुनाव कवरेज का आखिरी चरण चल रहा था और उन्हें चिंता थी कि वह इसे मिस कर देंगी. मैंने उनसे कहा कि वह अपनी सेहत को प्राथमिकता दें. वह जल्दी ठीक हो गईं. कुछ दिनों बाद, हम फिर साथ थे और 7, लोक कल्याण मार्ग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक घंटे तक इंटरव्यू कर रहे थे. मैं पंजाब के दौरे से इंटरव्यू के लिए आया था और समय पर कोविड टेस्ट करवाने को लेकर चिंतित था – जो प्रधानमंत्री से मिलने से पहले जरूरी था. पायल ने उसी कैलाश अस्पताल से मेरा कोविड टेस्ट और रिजल्ट जल्दी करवाने में मदद की – “चलो, मेरे बीमार होने का कोई फायदा तो हुआ,” उन्होंने हंसते हुए मुझसे कहा, जब हम उस शाम 7, LKM के लिए निकले.
इंटरव्यू शुरू होने से पहले, प्रधानमंत्री ने पायल की सेहत के बारे में पूछा. साफ था कि उन पर पायल की अच्छी छाप पड़ी थी. उस घटना के बाद, उन्होंने मुझे बताया कि वह ग्लूकोमीटर लगाए हुए थीं और अपनी सेहत पर बारीकी से नजर रख रही थीं. और फिर वह वापस काम पर लौट आईं. सुपर-एक्टिव. फील्ड पर. वही काम करते हुए जो उन्हें पसंद था. उन्होंने चुनावों के लिए बिहार की यात्रा की. उन्होंने पश्चिम बंगाल और असम में हालिया चुनावों की कवरेज की. उन्होंने बड़े इंटरव्यू किए, मुश्किल इंटरव्यू किए, ऐसे इंटरव्यू जिनके लिए ऐसी शारीरिक मेहनत की जरूरत होती है जो ज्यादातर लोग कभी देख नहीं पाते.
मुझे पटना की एक खास रात याद है. पायल दिल्ली से आई थीं और फिर असदुद्दीन ओवैसी का इंटरव्यू करने के लिए लगभग छह घंटे गाड़ी चलाकर गई थीं. जब वह उन तक पहुंची, तब आधी रात हो चुकी थी. उन्हें इंटरव्यू मिल गया. और उन्होंने पक्का किया कि हम उसे अगली सुबह ही चला दें, इससे पहले कि कोई और उन तक पहुंच पाता. रात के 2 बजे मेरा फोन बजा. “अब मैंने कर दिया है. तुम चलाओ.” उन्होंने अपना काम कर दिया था. अब मेरी बारी थी अपना काम करने की.
कई मायनों में, हमारा रिश्ता ऐसा ही था. वह स्टोरी के पीछे भागती थीं. मैं उसे ऑन-एयर करने की चिंता करता था. और किसी तरह, यह काम कर गया. पिछले महीने पायल का प्रमोशन हुआ. वह बहुत खुश थीं. मैंने उनसे कहा कि चैनल के लिए उन्होंने जितनी मेहनत की थी, उसके लिए वह इसी की हकदार थीं – उन्होंने जिन बड़ी हस्तियों को ऑन-एयर किया, जिन पॉलिटिकल स्कूप्स को खोजा, और हर असाइनमेंट में जो मेहनत की. वह खुश थीं. और हमेशा की तरह, आगे की सोच रही थीं.
पिछली बार मेरी उनसे लंबी बातचीत पिछले हफ़्ते लीला होटल में हमारे ‘ब्रिक्स डायलॉग्स’ इवेंट के दौरान हुई थी. हम साथ बैठे और ज़िंदगी के बारे में बात की. मैंने उनसे पूछा कि क्या वह अपने पिता के गुजरने के बाद अपनी मां को अपने साथ दिल्ली लाने का सोच रही हैं. मैंने उन्हें बताया कि तीन साल पहले मेरे पिता के गुजरने के बाद मेरी मां घर पर मेरा कितना बड़ा सहारा हैं. पायल ने कहा कि उनकी मां को कोलकाता पसंद है. “मेरे घर पर CCTV लगे हैं. देखो, मैं हर समय नजर रखती हूं,” उन्होंने मुझे अपने फोन पर दिखाया. उन्होंने व्रत रखा था और कहा कि वह खिचड़ी खाएंगी. हमने तुरंत उनके लिए खिचड़ी बनवाई. उन्होंने बड़े चाव से उसे खाया. अब मैं सोचता हूं, उस CCTV पर कौन नजर रखेगा?
और फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो पूरे दिन मेरे दिमाग में घूमता रहा. “अमन, मुझे बड़े इंटरव्यू करने हैं. PM का, CM का, सबका. मैं बड़े कामों के लिए बनी हूं.” उन्होंने यह बात उसी जाने-पहचाने भरोसे के साथ कही. उस इंसान का भरोसा जिसे यकीन था कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है. इतने सारे इंटरव्यू करने हैं. इतनी सारी कहानियां खोजनी हैं. और भी बहुत कुछ हासिल करना है. वह 46 साल की थीं. आने वाले मंगलवार, 22 सितंबर को वह 47 साल की हो जातीं.
रविवार को प्रधानमंत्री, देश के लगभग हर मुख्यमंत्री, कई केंद्रीय मंत्रियों, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे समेत कई लोगों ने शोक व्यक्त किया. हर तरह की विचारधारा वाले नेता पायल को जानते थे. उन्होंने पायल के सवालों, उनकी लगन, उनके फोन कॉल्स और स्टोरी पाने की उनकी जिद का सामना किया था. वे उनके काम का सम्मान करते थे. और शायद एक ऐसी पत्रकार के लिए यही सबसे सही श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस बात को सुनिश्चित करने में लगा दी कि कोई भी स्टोरी उनसे छूट न जाए.
CNN-NEWS18 के लिए यह एक बहुत बड़ा नुकसान है. पत्रकारिता के लिए, यह एक ऐसी रिपोर्टर का नुकसान है जो यह समझती थीं कि यह काम सिर्फ़ दिखने का नहीं, बल्कि मौके पर मौजूद रहने का है. उनके अनगिनत दोस्तों, साथियों और सबसे बढ़कर, उनके परिवार के लिए यह एक ऐसा नुकसान है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.
मेरे लिए, यह एक ऐसी साथी का नुकसान है जो कभी-कभी गुस्सा दिलाती थीं, अक्सर मज़ाकिया होती थीं, अपने काम के प्रति बेहद समर्पित थीं और अपने आप में ऐसी थीं जिनकी जगह कोई नहीं ले सकता. शुक्रवार रात, पायल अपने अगले इंटरव्यू की योजना बना रही थीं. मंगलवार को उन्हें काम पर लौटना था. लेकिन इसके बजाय, मंगलवार को हम उनके जन्मदिन पर उन्हें याद करेंगे.
काश मैं उसे यह बात एक बार और कहते हुए सुन पाता. “अमन, मुझे बड़े इंटरव्यू करने हैं. मैं बड़े कामों के लिए बनी हूं.” हां, पायल. तुम सच में ऐसी ही थीं. और तुमने ऐसा किया भी. ओम शांति.