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खुले खेत में विराजमान हैं फीट के गणपति एक ही पत्थर से बनी है अद्भुत प्रतिमा…


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तेलंगाना में 12वीं सदी से खेतों के बीच कायम 30 फीट के ऐश्वर्य गणपति की महिमा

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Aishwarya Ganapathi: तेलंगाना के आवांचा गांव में खेतों के बीच टीन शेड के नीचे विराजमान ऐश्वर्य गणपति की करीब 900 साल पुरानी विशाल प्रतिमा बेहद खास है. करीब 30 फीट ऊंची यह गणेश प्रतिमा एक ही प्राकृतिक ग्रेनाइट शिला को तराशकर बनाई गई है. 12वीं शताब्दी की इस ऐतिहासिक प्रतिमा का संबंध पश्चिमी चालुक्य काल से माना जाता है.

तेलंगाना. आमतौर पर प्राचीन और भव्य प्रतिमाएं बड़े मंदिरों के गर्भगृह में देखने को मिलती हैं, लेकिन तेलंगाना में एक ऐसी ऐतिहासिक गणेश प्रतिमा मौजूद है जो किसी विशाल मंदिर में नहीं बल्कि खुले खेतों के बीच एक साधारण टीन शेड के नीचे स्थापित है. नागरकर्नूल जिले के तिम्माजीपेटा मंडल अंतर्गत आवांचा गांव में स्थित यह प्रतिमा ऐश्वर्य गणपति के नाम से जानी जाती है. यह देश की सबसे बड़ी एकल पाषाण गणेश प्रतिमाओं में शुमार है.

इस प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे किसी जोड़ के बिना, एक ही विशाल प्राकृतिक ग्रेनाइट शिला को तराशकर बनाया गया है. जमीन से इसकी ऊंचाई लगभग 30 फीट और चौड़ाई करीब 15 फीट है. यह प्रतिमा रिलीफ शैली में तैयार की गई है यानी सामने से भगवान गणेश का दिव्य स्वरूप स्पष्ट रूप से उभरता है जबकि पीछे का हिस्सा मूल चट्टान के रूप में ही प्राकृतिक अवस्था में दिखता है.

इस प्रतिमा को लेकर गहरी धार्मिक आस्था

इतिहासकारों और अभिलेखों के मुताबिक, इस प्रतिमा का निर्माण 12वीं शताब्दी की शुरुआत यानी लगभग 1113 ईस्वी में पश्चिमी चालुक्य राजवंश के दौर में हुआ था. उस समय कल्याणी चालुक्य शासक विक्रमादित्य-VI के पुत्र तैलप ने आवांचा क्षेत्र को अपना प्रशासनिक केंद्र बनाया था. उसी दौर में इस विशाल शिला पर शिल्पकारों ने गणपति की इस अद्वितीय मूर्ति को तराशना शुरू किया था. माना जाता है कि उस समय राजनीतिक उथल-पुथल या युद्ध के चलते यह कार्य पूरी तरह संपन्न नहीं हो सका, जिसके कारण यह प्रतिमा आज भी आंशिक रूप से अधूरी दिखाई देती है.

स्थानीय ग्रामीणों में इस प्रतिमा को लेकर गहरी धार्मिक आस्था है. माना जाता है कि ऐश्वर्य गणपति के दर्शन करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है. गणेशोत्सव और संकष्टी चतुर्थी पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगता है. हालांकि करीब 900 साल पुरानी और ऐतिहासिक दृष्टि से अनमोल होने के बावजूद यह स्थल लंबे समय तक संरक्षण की बाट जोहता रहा. ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से धूप और बारिश से बचाने के लिए प्रतिमा के ऊपर शेड का निर्माण कराया है. यह स्थल हैदराबाद से करीब 80 से 85 किलोमीटर और जडचेर्ला से महज 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इतिहास प्रेमियों और स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि पुरातत्व विभाग और पर्यटन प्रशासन इस स्थल पर ध्यान दे, तो यह एक प्रमुख राष्ट्रीय धरोहर और हेरिटेज पर्यटन केंद्र बन सकता है.

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मोनाली पाल

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…

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