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भारत की दहलीज पर एक और संकट समंदर से निकल आ रही डायन कैसे आप पर है दोहरी मार का खतरा…


El-Nino 2026 Effect in India: भारत में चीनी महंगी हो गई है. बाजार में सब्जियों के दाम में भी आग लगी है. जनता पर महंगाई की मार पड़ने लगी है. अब सवाल है कि आखिर अचानक यह हो क्यों रहा है? तो इसका जवाब है अल-नीनो. जी हां, प्रशांत महासागर में अल नीनो का असर बढ़ रहा है. पैसिफिक ओशन में मजबूत होता अल नीनो भारत की फूड इकॉनमी के लिए एक नया खतरा बनकर उभर रहा है. अगर पूरे देश में इस अलनीनो का असर बढ़ता है, तो यह मौसम की घटना फसल के उत्पादन को बिगाड़ सकती है. बाजार में अनाज और दूसरी कृषि उपज की सप्लाई कम कर सकती है और खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर दबाव डाल सकती है.

यह खतरा ऐसे समय में सामने आया है, जब इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) ने पहले ही चेतावनी दी है कि खाने-पीने की चीजों और ईंधन की महंगाई वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की आर्थिक विकास दर पर असर डाल सकती है. रेटिंग एजेंसी ने इस साल के लिए जीडीपी ग्रोथ 6.8 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है. यह वित्त वर्ष 2025-26 के 7.6 फीसदी के मुकाबले कम है.

इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने अनुमान लगाया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में खुदरा महंगाई औसतन 4.9% रह सकती है. पिछले वित्त वर्ष में यह सिर्फ 2% थी. एजेंसी ने खास तौर पर अल नीनो की वजह से खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ने के खतरे का जिक्र किया है, जो ग्रोथ को रोक सकता है. हालांकि, खेती-बाड़ी के मामले में अभी स्थिति उतनी चिंताजनक नहीं है.

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 18 अगस्त को कहा था कि इस साल की खरीफ फसल पर अल नीनो का बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है. हालांकि, कुछ इलाकों में स्थानीय स्तर पर फसलों को नुकसान हो सकता है. चौहान ने कहा, ‘कुछ जगहों को छोड़कर अल नीनो का कोई बड़ा असर दिखाई नहीं दे रहा है.  कुल मिलाकर स्थिति अच्छी बनी हुई है.’ उन्होंने यह भी कहा कि देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश फसलों की पानी की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त रही है.

भारत में खाने-पीने की चीजों की कीमतों के लिए अल नीनो क्यों अहम है

अल नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की एक प्राकृतिक घटना है. इससे दुनिया के कई हिस्सों में हवा के बहाव, बारिश और तापमान पर असर पड़ता है. भारत के लिए इसका सबसे बड़ा असर मानसून और खेती पर पड़ता है.

कमजोर या असमान मानसून उन फसलों की पैदावार कम कर सकता है जो बारिश पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं. खासकर उन इलाकों में जहां सिंचाई की भरोसेमंद सुविधा नहीं है. कम उत्पादन से सप्लाई कम हो सकती है और होलसेल और रिटेल कीमतें बढ़ सकती हैं.

इसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता. खराब फसल पूरी फूड सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकती है. जैसे खरीद और स्टोरेज से लेकर ट्रांसपोर्ट, प्रोसेसिंग और रिटेल तक. मुख्य फसलों की कम उपलब्धता से इंपोर्ट यानी आयात की मांग भी बढ़ सकती है. इससे भारतीय कंज्यूमर इंटरनेशनल कीमतों के संपर्क में आ सकते हैं और देश के इंपोर्ट बिल पर दबाव बढ़ सकता है.

बहरहाल, Ind-Ra ने चेतावनी दी है कि अल नीनो से होने वाली महंगाई का असर कच्चे तेल की कम कीमतों से भारत को मिलने वाले कुछ फायदों को खत्म कर सकता है.  “Ind-Ra के चीफ इकोनॉमिस्ट देवेंद्र पंत ने कहा, ‘वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल की कीमत करीब 85 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान है. तेल की कम कीमतों से भारत को फायदा होता है, क्योंकि इससे व्यापार घाटा और चालू खाते का घाटा कम होता है. हालांकि, अल-नीनो के कारण बढ़ती महंगाई तेल की कम कीमतों से मिलने वाले ग्रोथ के फायदे को सीमित कर सकती है.’

खरीफ फसल की स्थिति काफी हद तक स्थिर बनी हुई है

कुछ इलाकों में कम बारिश के बावजूद भारत का कृषि क्षेत्र अब तक बड़े पैमाने पर किसी व्यवधान से बचा हुआ है. 14 अगस्त तक 1,016.57 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुवाई हो चुकी थी, जो इस मौसम में आमतौर पर कवर किए जाने वाले औसत क्षेत्र का 92% है. यह क्षेत्र पिछले साल के स्तर से लगभग 2% कम था.

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि बुवाई में अंतर काफी कम हो गया है और संवेदनशील माने जाने वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर लगभग 100 हो गई है. खरीफ उत्पादन पर कम बारिश के असर के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘अभी तक हमें कोई असर नहीं दिख रहा है.’ हालांकि, स्थिति एक जैसी नहीं है.

कर्नाटक और तेलंगाना में पानी की कमी का सामना करना पड़ा है, जबकि पूर्वी, पूर्वोत्तर और दक्षिणी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में बारिश की कमी अधिक रही है. भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों से पता चला है कि 12 अगस्त तक कुल मानसून की कमी 12% थी. यह कमी पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 26%, दक्षिणी प्रायद्वीप में 19% और उत्तर-पश्चिम भारत में 11% थी.

हालांकि, क्षेत्रीय अंतर मायने रखता है क्योंकि अल-नीनो का असर एक जैसा नहीं होता है. देश के कुछ हिस्सों में कम बारिश हो सकती है जबकि अन्य हिस्सों में सामान्य या बहुत अधिक बारिश हो सकती है.

अल नीनो का बढ़ता खतरा, महंगी होगी रसोई? समझिए कैसे फसल से आपकी जेब तक पहुंचेगा असर

खाद्य महंगाई का असर पूरी अर्थव्यवस्था में कैसे फैल सकता है?

मौसम की वजह से अगर फसलों को नुकसान होता है तो इसका सबसे पहला असर आमतौर पर कृषि उत्पादों की कीमतों पर पड़ता है. लेकिन अगर लंबे समय तक फसलों की सप्लाई प्रभावित रहती है तो इसका असर धीरे-धीरे पूरी खाद्य अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

अगर अनाज, दाल, तिलहन, सब्जियों या दूसरी फसलों का उत्पादन कम होता है तो बाजार में इनकी उपलब्धता घट सकती है. मांग पहले जैसी बनी रहती है और सामान कम हो जाता है तो कीमतें बढ़ सकती हैं.

इसके बाद खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियों और दुकानदारों को किसानों और दूसरे सप्लायर्स से सामान खरीदने में ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है. अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है तो बढ़ी हुई लागत का असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है.

परिवारों के लिए इसका मतलब है कि रोजमर्रा की जरूरी खाद्य चीजों पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है. वहीं, सरकार के लिए इसका मतलब है कि सरकार पर भी कीमतों को काबू में रखने का दबाव बढ़ सकता है. सरकार को इसके लिए अपने भंडार से खाद्यान्न जारी करने, ज्यादा सामान विदेशों से मंगाने या कीमतों को नियंत्रित करने के लिए निर्यात पर रोक जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं.

खाने-पीने की चीजों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी मॉनेटरी पॉलिसी को मुश्किल बना सकती है, क्योंकि इससे ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश कम हो जाती है, भले ही आर्थिक विकास धीमा हो रहा हो.

भारत अकेला ऐसा देश नहीं, जिसे अल नीनो का खतरा

मौजूदा अल नीनो अब एक ग्लोबल क्लाइमेट इवेंट यानी वैश्विक जलवायु घटना का रूप ले रहा है. इसका असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के कई देशों में मौसम का मिजाज बदल सकता है.

अमेरिकी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के आंकड़ों का इस्तेमाल करने वाले क्लाइमेट ब्रिंक डैशबोर्ड के मुताबिक, प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान 30 साल के औसत तापमान से करीब 2.6 डिग्री सेल्सियस ज्यादा है.

अनुमानों के मुताबिक, नवंबर तक यह अंतर बढ़कर 3.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. अगर ऐसा हुआ तो यह 2015 के बेहद शक्तिशाली अल नीनो के दौरान दर्ज करीब 3 डिग्री सेल्सियस के तापमान अंतर से भी ज्यादा होगा.

अमेरिकी संस्था क्या क्या है अनुमान

अमेरिकी संस्था NOAA का अनुमान है कि मौजूदा अल नीनो के 1950 से उपलब्ध उसके रिकॉर्ड में अब तक का सबसे शक्तिशाली अल नीनो बनने की 69% संभावना है. इस घटना से दुनिया भर में मौसम के हालात बहुत अलग-अलग हो सकते हैं. कुछ इलाके ज़्यादा गर्म और सूखे हो जाते हैं, जबकि कुछ इलाकों में भारी बारिश, तूफ़ान और बाढ़ का सामना करना पड़ता है.

उदाहरण के लिए इंडोनेशिया में पहले ही लंबे समय तक सूखा मौसम रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर जंगल की आग लगी है. अमेरिकी संस्था NOAA की अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन टीम की प्रमुख मिशेल ल’ह्यूरो ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा कि आमतौर पर अल नीनो जितना मजबूत होता है, उससे जुड़े सामान्य असर की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है. हालांकि, किसी खास इलाके में इसका बिल्कुल क्या असर होगा, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती.

वहीं, मियामी यूनिवर्सिटी की क्लाइमेट साइंटिस्ट एमिली बेकर ने कहा कि ट्रॉपिकल पैसिफिक यानी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में होने वाले बदलावों का असर सिर्फ उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता. ये बदलाव पूरे वैश्विक वायुमंडल में लहर की तरह असर पैदा करते हैं.

2027 और भी अहम क्यों हो सकता है

अल नीनो की घटना शुरू होने के बाद दुनिया के तापमान पर इसका असर अधिक साफ तौर पर दिखाई देता है. क्लाइमेट साइंटिस्ट ज़ेक हॉसफ़ादर और एंड्रयू डेसलर का अनुमान है कि मौजूदा अल नीनो की वजह से 2027 में ग्लोबल वार्मिंग के मौजूदा ट्रेंड में लगभग 0.3°C की बढ़ोतरी हो सकती है.

उनके हिसाब से ग्लोबल तापमान प्री-इंडस्ट्रियल लेवल से लगभग 1.76°C ज़्यादा हो सकता है. अगर यह अनुमान सही साबित होता है, तो 2027 अब तक का सबसे गर्म साल होगा.अभी सालाना रिकॉर्ड 2024 के नाम है.

एएफपी के अनुसार, टेक्सास A&M यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेसलर ने तापमान में होने वाली इस संभावित बढ़ोतरी को भविष्य की एक झलक बताया है. NOAA के वैज्ञानिक माइक मैकफैडेन ने अलग से कहा कि अगर अनुमान सच होते हैं, तो 2027 में तापमान का प्री-इंडस्ट्रियल लेवल से लगभग 1.7°C ऊपर पहुंचना असंभव नहीं है.

जलवायु परिवर्तन जोखिम को और बढ़ाता है

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है, लेकिन इसका असर इंसानों की वजह से हो रही ग्लोबल वार्मिंग के माहौल में दिख रहा है. गर्म हवा में अधिक नमी हो सकती है. इससे भारी बारिश और तेज हो सकती है.  साथ ही, अधिक तापमान से मिट्टी जल्दी सूख सकती है और उन इलाकों में सूखा और गंभीर हो सकता है जहां पहले से ही कम बारिश होती है.

वैज्ञानिक अभी भी इस बात पर रिसर्च कर रहे हैं कि क्या जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर अल नीनो की घटनाओं की तीव्रता को बढ़ाता है या नहीं.

साइंटिस्ट मैकफैडेन ने कहा कि कुछ पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड, कोरल डेटा और क्लाइमेट मॉडल से मिले सबूत बताते हैं कि पिछली सदी में अल नीनो की तीव्रता (एम्प्लीट्यूड) में लगभग 10% की बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने कहा, ‘क्लाइमेट चेंज शायद अल नीनो चक्र को ही और तेज कर रहा है.’

भारत के लिए अभी क्या चिंता की बात है?

भारत के लिए तुरंत समझने वाली बात यह है कि अल नीनो से खेती को हुआ नुकसान अभी बड़े पैमाने पर नहीं है. लेकिन मानसून में कमी, इलाके में पानी की किल्लत और प्रशांत महासागर में मौसम की घटना के और मजबूत होने का मिला-जुला असर फूड सप्लाई चेन को जोखिम में डालता है. अगर मौसम के आगे बढ़ने के साथ फसल का नुकसान बढ़ता है, तो इसका दबाव किसानों से आगे बढ़कर फूड प्रोसेसर, रिटेलर और आखिर में खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों के जरिए भारतीय परिवारों तक पहुंच सकता है.



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