नई दिल्ली (Former Maoists Clear SSC Exam). कुछ लोगों को जिंदगी ऐसे दोराहे पर खड़ा कर देती है, जहां एक तरफ बंदूकों की गड़गड़ाहट और दूसरी तरफ किताबों की खामोशी होती है. तब सही रास्ता चुनना चुनौती बन जाता है. छत्तीसगढ़ के जंगलों में कभी बंदूक थामने वाले कुछ युवाओं ने जब हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज में लौटने का फैसला किया तो किसी ने नहीं सोचा था कि वे इतनी जल्दी नई इबारत लिखेंगे. पिछले साल हथियार डालने वाले 210 माओवादियों में से 7 ने छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल की एसएससी परीक्षा में शानदार सफलता हासिल की है.
अतीत को पीछे छोड़ रचा भविष्य
जेल की सलाखों के पीछे या पुनर्वास केंद्रों में रहते हुए इन लोगों ने अपनी अधूरी पढ़ाई को दोबारा शुरू करने की जिद पकड़ी. किसी ने टैबलेट पर ऑनलाइन किताबें पढ़कर रातें एक कीं तो किसी को साथियों का साथ मिला. आज इनकी कामयाबी उन तमाम युवाओं के लिए बड़ा सबक है जो किसी भी वजह से अपने जीवन में पिछड़ गए हैं.
गीता की दास्तान: छठी कक्षा में छूटी पढ़ाई, 35 साल की उम्र में बनीं ‘डॉ चंपा’
जेल की चारदीवारी से किताबों के पन्नों तक का सफर
डिजिटल गैजेट्स और WhatsApp ने ऐसे आसान की पढ़ाई
जंगलों और गांवों से ताल्लुक रखने वाले इन पूर्व विद्रोहियों के लिए अचानक से पढ़ाई के माहौल में ढलना आसान नहीं था. लेकिन मॉडर्न टेक्नोलॉजी और मददगार दोस्तों ने उनका सफर आसान बना दिया. इनमें से कई के पास पढ़ाई के लिए टैबलेट थे, जिन पर वे ऑनलाइन चैप्टर और पीडीएफ पढ़ा करते थे. कुछ युवाओं ने बताया कि उनके दोस्तों ने WhatsApp के जरिए पढ़ाई में उनकी मदद की, नोट्स भेजे और कठिन सवालों के जवाब समझाए. पुलिसकर्मियों और लोकल टीचर्स ने भी इनकी बहुत मदद की, जिससे इनका कॉन्फिडेंस लगातार बढ़ता गया.
नफरत और हिंसा छोड़कर विकास की रोशनी का दामन
पूर्व माओवादियों की सक्सेस स्टोरी इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि समाज और शासन किसी भटके हुए इंसान को सही दिशा और अवसर दे तो वह पॉजिटिव बदलाव ला सकता है. आज ये सातों पूर्व माओवादी उन युवाओं के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं जो अभी भी हथियारों की अंधेरी दुनिया में फंसे हुए हैं. इनकी सफलता पैगाम देती है कि बंदूक से कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता. असली ताकत और मुक्ति केवल कलम और शिक्षा में ही है.