आजकल घर-घर में एक नई पीढ़ी की आवाज गूंज रही है. चाहे आप उन्हें जेन Z कहें या जेन G, नाम की बहस बेमानी है. असल बात यह है कि ये युवा आपके घर की दहलीज पर दमदार दस्तक दे चुके हैं. स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और ग्लोबल कल्चर के प्रभाव से लैस यह पीढ़ी न सिर्फ अपनी पहचान बना रही है, बल्कि पुरानी पीढ़ी की आदतों, भाषा और जीवनशैली को भी चुनौती दे रही है. 2020 के दशक के मध्य में पहुंच कर यह स्पष्ट हो गया है कि अब किसी का इस बदलाव से बच पाना असंभव है. माता-पिता, दादा-दादी, यहां तक कि बड़े भाई-बहन भी इनके असर से अछूते नहीं रह पा रहे.
जेन Z का प्रतिनिधित्व करने वाले किशोर-युवा की भाषा, खान-पान, दिनचर्या, रिश्तों के तरीके और तकनीक के प्रति दृष्टिकोण बिल्कुल अलग हैं. अपने भारतीय संस्कारों को यह पीढ़ी बूढ़ों के दौर की बातें मानती है. इस पीढ़ी के लोगों को एक मंच पर लाने की कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने पहल की तो ये बिना कुछ सोचे-विचारे उसके इशारे पर बौरा गए. इसकी झलक उन घरों में भी देखने को मिली, जिनकी प्रतिबद्धता भारतीय संस्कारों के प्रति रही है. असम में भाजपा के के एक मंत्री की बेटी का सीजेपी को समर्थन इसका एक नमूला है. सच तो यह है कि अपने को कॉकरोच कह कर इतराने वाली इस पीढ़ी की धमक हर घर में साफ सुनाई पड़ रही है.
बोलचाल की नई शब्दावली
जेन Z या G की सबसे पहली और सबसे तेज दस्तक उनकी भाषा में सुनाई देती है. पुरानी पीढ़ी की हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित बातचीत अब पूरी तरह बदल चुकी है. अब घर में ‘हां भाई’, ‘ओके’ या ‘ठीक है’ की जगह ‘ब्रुह’, ‘फाह’, ‘यू बेट’’ ‘लिट’, ‘स्लै’ और ‘नो कैप’ जैसे शब्द आम हो गए हैं. ये शब्द सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम, रील्स, टिकटॉक और यूट्यूब शॉर्ट्स से आए हैं. ‘वाइब चेक’ करना, ‘मेन कैरेक्टर’ बनना या किसी बात को ‘क्रिंज’ कहना अब रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा है. दिलचस्प बात यह है कि ये युवा हिंदी को भी नई शैली में ढाल रहे हैं. ‘क्या सीन है’ अब सिर्फ फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि कोई भी स्थिति पूछने का तरीका बन गया है. ‘मजा आ गया’ की जगह ‘फायर’ या ‘ऑन फायर’ कहा जाता है. पेरेंट्स अक्सर शिकायत करते हैं कि बच्चे उनकी बात समझ नहीं पाते, लेकिन सच यह है कि बच्चे जान-बूझ कर एक अलग भाषाई पहचान बना रहे हैं. यह भाषा सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि अपनी पीढ़ी की एकजुटता का प्रतीक भी है. स्कूल, कालेज और ऑनलाइन ग्रुप्स में यह शब्दावली इतनी तेज फैलती है कि माता-पिता को भी कभी-कभी ‘गूगल’ करना पड़ता है. 2024-25 में भारतीय युवाओं के बीच यह ट्रेंड और तेज हुआ है, क्योंकि ग्लोबल कंटेंट अब क्षेत्रीय भाषाओं में भी आसानी से उपलब्ध है. नतीजा यह कि घर की पुरानी बातचीत अब नई शब्दावली के साथ मिश्रित हो गई है. इससे कोई बच नहीं पा रहा. घर के बुजुर्ग या बड़े दादा-दादी भी कभी-कभी ‘वाओ’ कहने में संकोच नहीं करते.
खान-पान, पहनावा अलहदा
भाषा के बाद सबसे बड़ा बदलाव खान-पान और पहनावे में दिखता है. जेन Z के लिए खाना सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक अनुभव मात्र है. पुराने जमाने की दाल-रोटी-सब्जी की जगह अब एवोकाडो टोस्ट, सुशी, कोरियाई किमची, और प्लांट-बेस्ड बर्गर ने ले ली है. घर में मां के हाथ का खाना तो पसंद है, लेकिन ‘एस्थेटिक’ प्लेटिंग और इंस्टाग्राम-योग्य लुक जरूरी है. कॉफी अब सिर्फ चाय का विकल्प नहीं, बल्कि ‘कॉफी डेट’ और ‘वर्क फ्रॉम कैफे’ का हिस्सा बन गई है. कई युवा शाकाहारी या फ्लेक्सिटरियन बन गए हैं. पहनावे में भी अलगाव साफ है. फॉर्मल शर्ट-पैंट की जगह ओवरसाइज्ड टी-शर्ट, कार्गो पैंट्स, स्नीकर्स और बैगी जींस ने ले ली है. ‘थ्रिफ्टिंग’ यानी पुराने कपड़े खरीदना अब स्टेटस सिंबल है. ब्रांडेड चीजें तो चाहिए, लेकिन सस्टेनेबल और यूनीक होनी चाहिए. लड़के-लड़कियों दोनों में जेंडर-न्यूट्रल फैशन बढ़ रहा है. घर में माता-पिता अक्सर कहते हैं- यह कैसा पहनावा है, लेकिन युवा जवाब देते हैं- यह मेरा स्टाइल है. त्योहारों पर भी पारंपरिक कपड़ों के साथ मॉडर्न ट्विस्ट दिखता है. साड़ी के साथ स्नीकर्स या कुर्ता के साथ जैकेट. यह बदलाव सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि आत्म अभिव्यक्ति का माध्यम है. शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक यह लहर फैल चुकी है. कोई भी घर अब पूरी तरह पारंपरिक खान-पान और पहनावे में बदलाव से अछूता नहीं रह गया है.
सोने-जागने का अलग रूटीन
दिनचर्या में भी जेन Z ने पुरानी पीढ़ी को हैरान कर दिया है. सुबह जल्दी उठना, योग करना और रात को जल्दी सोना अब पुरानी कहानी लगती है. ये युवा रात के 1-2 बजे तक स्क्रॉल करते हैं, रील्स देखते हैं, गेम खेलते हैं या स्टडी करते हैं. नाइट आउल होना उनके लिए नार्मल है. सुबह 10-11 बजे उठना आम बात है. खासकर जब ऑनलाइन क्लासेस या फ्रीलांस काम हों. स्लीप साइकिल पूरी तरह उलटी हो गई है. कई युवा पावर नैप या माइक्रोस्लीप पर निर्भर रहते हैं. माता-पिता चिंतित रहते हैं कि स्वास्थ्य खराब होगा, लेकिन युवा कहते हैं कि उनकी प्रोडक्टिविटी रात में ज्यादा है. ग्लोबल टाइम जोन के कारण कई फ्रीलांसर या कंटेंट क्रिएटर रात में काम करते हैं. सोशल मीडिया का FOMO (Fear of Missing Out) भी देर रात तक जागने का बड़ा कारण है. घर में अब सोने का समय तय करना मुश्किल हो गया है. टीवी की जगह फोन और लैपटॉप ने ले ली है. यह रूटीन परिवार के अन्य सदस्यों को भी प्रभावित कर रहा है. माता-पिता भी कभी-कभी देर रात तक जाग जाते हैं बच्चों की गतिविधियों को समझने के लिए.
पापा के लिए ‘अरे यार’ सहज
रिश्तों में सबसे बड़ा बदलाव माता-पिता, खासकर पिता के साथ व्यवहार में दिखता है. पुरानी पीढ़ी में पिता का डर और सम्मान औपचारिक होता था. पापा कह कर बात करना, आदरसूचक भाषा का इस्तेमाल जरूरी था. अब जेन Z के लिए ‘अरे यार’ कहना बिल्कुल सहज है. दोस्ती वाला रिश्ता बनाने की कोशिश साफ दिखती है. पिता से भी मीम्स शेयर किए जाते हैं, गेम खेले जाते हैं और खुल कर राय मांगी जाती है. यह बदलाव काफी हदतक सकारात्मक भी है. युवा अपने माता-पिता को दोस्त की तरह देखते हैं, जिससे संवाद बेहतर होता है. लेकिन कभी-कभी सीमाएं धुंधली हो जाती हैं. पिता को ‘ब्रो’ कहना या मजाक में ‘ओल्ड मैन’ कहना अब आम है. कई परिवारों में यह स्वीकार कर लिया गया है, क्योंकि युवा स्वतंत्रता और समानता चाहते हैं. महिलाओं के साथ भी यही रुख है. मां को भी ‘यार’ कह कर बातचीत होती है. यह जेनरेशन गैप को कम करने का प्रयास है, लेकिन पुरानी पीढ़ी को अभी भी अजीब लगता है. घर-घर में यह नई सहजता दस्तक दे चुकी है. पापा भी अब बच्चों को कभी-कभी ‘अरे यार’ कहने में संकोच नहीं करते.
बूढ़े बन जाएंगे पुराने लैपटॉप
तकनीक के मामले में जेन Z सबसे आगे है. उनके लिए लैपटॉप या फोन जल्दी ही ओल्ड या बूढ़ा हो जाता है. हर दो साल में नया डिवाइस चाहिए. हाई-स्पीड इंटरनेट, AI टूल्स, क्लाउड स्टोरेज और गेमिंग रिग अब जरूरत बन गए हैं. स्कूल-कॉलेज के प्रोजेक्ट से लेकर कंटेंट क्रिएशन तक सब कुछ हाई-टेक डिवाइस पर निर्भर है. पुराने कंप्यूटर को देख कर वे कहते हैं- यह तो रिटायर हो गया. जेन Z के लिए पुराने अब बेकार लगते हैं. उनके इस रवैए से परिवार के बजट पर असर पड़ता है. माता-पिता अक्सर शिकायत करते हैं कि बच्चे लगातार अपग्रेड की मांग करते हैं. तब युवा तर्क देते हैं कि बेहतर तकनीक से बेहतर अवसर मिलते हैं. AI चैटबॉट्स, वर्चुअल रियलिटी और नए ऐप्स उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं. घर में पुराने गैजेट्स अब सिर्फ सजावट के सामान बन कर रह गए हैं. यह बदलाव इतना तेज है कि मध्यवर्गीय परिवार भी इससे अछूते नहीं रह पा रहे. परिवार के बूढ़े-बड़ों को भी नई पीढ़ी पुराने गैजेट्स की तरह खाारिज करती जा रही है.
Gen Z की कई खूबियां भी हैं
जेन Z की बदली आदतों में कई खूबियां भी हैं. सीनियरटी की परवाह किए बगैर यह पीढ़ी सीधे संवाद से पीछे नहीं हटती. अपनी बात बेबाकी से सबके सामने कहने में संकोच नहीं करती. समर्थन या विरोध के लिए यह दूसरे के विचारों से प्रभावित नहीं होती. जाति-धर्म के इस पीढ़ी के लिए कोई मायने नहीं. वह हवा के प्रवाह के साथ चलती है. उसे समय के साथ हो रहे बदलाव सहर्ष स्वीकार हैं. इस पीढ़ी के बच्चों को विदेशी भाषा के शब्दों के इस्तेमाल से परहेज नहीं. सीजेपी के आंदोलन का इश्यू इन्हें पसंद आया तो ये किसी कीपरवाज किए बगैर उसके समर्थन में कूदने से पीछे नहीं रहे. 12 साल पहले इस पीढ़ी के फर्स्ट टाइम वोटर को नरेंद्र मोदी में आकर्षण दिखता था. अब उन्हें यह पीढ़ी खारिज करती नजर आ रही है तो इसके पीछे सालदर साल बदलता जेन Z का मिजाज है. यह पीढ़ी तेज बदलाव की वाहक बन गई है.