जरा सोचिए..एक स्कूल की प्रिंसिपल अपने घर पर हैं. फोन पर किसी से बात कर रही हैं.अचानक उन्हें कोई दिखाई देता है. वह शायद उसे पहचान भी लेती हैं. फोन पर उनकी जुबान से एक शब्द निकलता है-‘बाबू’…और इसके बाद फोन बंद हो जाता है.कुछ देर बाद पता चलता है कि प्रिंसिपल की बेरहमी से हत्या कर दी गई है. शरीर पर चाकू के एक-दो नहीं, बल्कि 27 वार किए गए हैं और जब पुलिस इस कहानी की परतें खोलती है तो सबसे बड़ा झटका लगता है. जिन पर हत्या का आरोप है वे कोई पेशेवर अपराधी नहीं,बल्कि उसी स्कूल के 10वीं कक्षा के दो नाबालिग छात्र हैं. यहीं से सवाल शुरू होता है-आखिर ये कैसे स्टूडेंट्स हैं?जिनके हाथों में किताब और कलम होनी चाहिए उनके हाथों में चाकू कैसे पहुंच गया? जिस शिक्षक से पढ़ाई, अनुशासन और जिंदगी जीने का तरीका सीखना था वही उनकी हिंसा का शिकार कैसे बन गया?
‘बाबू’…एक शब्द और खुलने लगी हत्या की गुत्थी
तेलंगाना के नलगोंडा जिले में निजी स्कूल की प्रिंसिपल के.रूपा रेड्डी की 11 अगस्त 2026 को उनके घर में हत्या कर दी गई. पुलिस के मुताबिक दो नाबालिग छात्रों ने लूट के इरादे से उनके घर में घुसने की योजना बनाई थी लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प सुराग किसी CCTV कैमरे से नहीं, बल्कि एक शब्द से मिला-‘बाबू’.हत्या से ठीक पहले रूपा रेड्डी फोन पर बात कर रही थीं. इसी बातचीत के दौरान उन्होंने ‘बाबू’ शब्द कहा और उसके बाद फोन बंद हो गया. जांचकर्ताओं ने इस शब्द को गंभीरता से लिया, क्योंकि बताया गया कि रूपा रेड्डी स्कूल के बच्चों को भी ‘बाबू’ कहकर संबोधित करती थीं.पुलिस का ध्यान स्कूल के छात्रों की ओर गया.इसके बाद CCTV फुटेज, फॉरेंसिक और तकनीकी सबूतों की जांच शुरू हुई. कई लोगों से पूछताछ की गई. धीरे-धीरे शक उन दो छात्रों तक पहुंचा जो वारदात के बाद अचानक पैसे खर्च करने लगे थे.
पैसे की चाह और महंगे शौक ने रची खौफनाक कहानी?
पुलिस की जांच के मुताबिक दोनों छात्रों ने प्रिंसिपल के घर से पैसे लूटने की योजना बनाई थी. उन्हें कथित तौर पर जानकारी थी कि स्कूल में फीस जमा होने के कारण घर में बड़ी रकम हो सकती है लेकिन इस कहानी में सिर्फ पैसा ही नहीं था.जांच में सामने आया कि एक छात्र पहले हॉस्टल में रहता था.स्कूल प्रबंधन ने उसके पास मोबाइल और नकदी मिलने के बाद उसे डांटा था.इसके बाद उसे हॉस्टल से निकालकर डे-स्कॉलर कर दिया गया और उसके परिवार को भी जानकारी दी गई यानी प्रिंसिपल से नाराजगी की एक वजह पहले से थी.पुलिस के मुताबिक आरोपी छात्रों में से एक को कार और बाइक का शौक था और वह जल्दी पैसा कमाना चाहता था. दोनों को शराब पीने की आदत होने की बात भी जांच में सामने आई.अब इन चीजों को जोड़िए-पैसे की जरूरत, महंगे शौक, कथित नाराजगी और अपराध की योजना और फिर कहानी वहां पहुंचती है जहां पहुंचने की शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी.
वारदात से पहले खरीदे चाकू और दस्ताने, इलाके की रैकी की
पुलिस के मुताबिक छात्रों ने वारदात को अचानक अंजाम नहीं दिया था.इसके लिए पहले से तैयारी की गई थी.वारदात से कुछ दिन पहले कथित तौर पर चाकू और दस्ताने खरीदे गए.घर और इलाके की रैकी की गई.CCTV कैमरों पर भी नजर रखी गई.11 अगस्त को एक छात्र कथित तौर पर घर के अंदर गया जबकि दूसरा बाहर निगरानी कर रहा था लेकिन अंदर पहुंचने के बाद कहानी बदल गई. रूपा रेड्डी ने आरोपी छात्र को देख लिया.पुलिस के मुताबिक पहचान सामने आने के डर से उस पर हमला कर दिया गया और चाकू से 27 बार वार किए गए.एक शिक्षक जिसने शायद उस छात्र को कभी पढ़ाया होगा, उसे डांटा होगा, उसके भविष्य को लेकर समझाया होगा वही उस रात उसके हाथों मौत का शिकार हो गईं.
खून लगे 500 रुपये के नोट और आईफोन ने बढ़ाया शक
हत्या के बाद पुलिस को आरोपियों के पास से नकदी,आईफोन,मोबाइल फोन,चाकू,दस्ताने और मास्क मिलने की जानकारी सामने आई.एक आरोपी के पास करीब 1.51 लाख रुपये बरामद होने की बात कही गई है.शुरुआत में छात्र ने कथित तौर पर दावा किया कि पैसा उसके माता-पिता ने दिया था लेकिन फॉरेंसिक जांच में कुछ नोटों पर खून के निशान मिले.पुलिस के अनुसार 500 रुपये के तीन नोटों पर खून के धब्बे मिले.यही सबूत जांच के लिए अहम साबित हुए क्योंकि अपराध के बाद कहानी चाहे जितनी बदल दी जाए फॉरेंसिक सबूत अक्सर सच तक पहुंचने का रास्ता खोल देते हैं.
लेकिन सवाल सिर्फ इस हत्या का नहीं है…
अब जरा तेलंगाना के नलगोंडा से अलग दूसरे राज्य हरियाणा की एक घटना याद कीजिए.10 जुलाई 2025, हिसार.एक स्कूल के प्रिंसिपल जगबीर पन्नू की स्कूल परिसर में चाकू मारकर हत्या कर दी गई.पुलिस की जांच में नाबालिग छात्रों की भूमिका सामने आई.शुरुआती जांच में छात्रों और स्कूल प्रशासन के बीच अनुशासन को लेकर विवाद की बात सामने आई थी.रिपोर्टों के मुताबिक छात्रों की नाराजगी स्कूल के नियमों और अनुशासन से जुड़ी थी.मामला इतना बढ़ गया कि विवाद ने हिंसक रूप ले लिया.एक तरफ नलगोंडा में पैसे और कथित पुरानी नाराजगी का एंगल सामने आया तो दूसरी तरफ हिसार में अनुशासन को लेकर विवाद की बात सामने आई.दोनों घटनाएं अलग हैं लेकिन दोनों में एक सवाल कॉमन है-क्या शिक्षक और छात्र के बीच संवाद की जगह टकराव बढ़ता जा रहा है?
शिक्षक की डांट कब दुश्मनी बन जाती है?
स्कूल में शिक्षक का काम सिर्फ पढ़ाना नहीं है. वह बच्चे को गलत काम से रोकता है.डांटता है.कभी मोबाइल छीनता है. कभी स्कूल के नियमों का पालन करने को कहता है. कभी बाल कटवाने को कहता है.कभी किसी गलत आदत पर माता-पिता को बुलाता है यानी शिक्षक का काम कई बार बच्चे को वह बात बताना भी होता है जो उसे उस समय अच्छी नहीं लग लेकिन अगर बच्चे के मन में यह भावना बैठ जाए कि टीचर ने मुझे अपमानित किया.मेरे साथ गलत किया.मेरी आजादी छीन ली और उस गुस्से को समय रहते समझा न जाए तो बात गंभीर हो सकती है.यही वजह है कि स्कूलों में अनुशासन जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है कि बच्चे अपनी नाराजगी और गुस्सा व्यक्त करना भी सीखें.
क्या सिर्फ डांट और सजा काफी है?
यहां स्कूलों के लिए भी एक बड़ा सवाल है.अगर किसी बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव आ रहा है वह बिना वजह पैसे खर्च करने लगा है नशे या आक्रामक व्यवहार की तरफ जा रहा है लगातार किसी शिक्षक से नाराज है या स्कूल के नियमों के खिलाफ असामान्य प्रतिक्रिया दे रहा है तो सिर्फ उसे सजा देकर मामला खत्म कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता.ऐसे मामलों में काउंसलिंग, माता-पिता से बातचीत और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद भी जरूरी है क्योंकि 15-16 साल की उम्र में बच्चा गलत और सही के बीच फर्क समझने की प्रक्रिया में होता है. उसे सीमा बताना जरूरी है लेकिन यह समझाना भी जरूरी है कि गुस्से और असहमति से कैसे निपटना है?
और परिवार? उसकी भूमिका भी कम नहीं
नलगोंडा मामले में जिस तरह पैसे,महंगे शौक और कथित शराब की आदत जैसी बातें जांच में सामने आईं.वे सिर्फ स्कूल की चिंता नहीं हैं.बच्चा अचानक महंगे फोन या बाइक की बात करने लगे.उसके पास जरूरत से ज्यादा पैसा आने लगे. दोस्तों के बीच अपना स्टेटस दिखाने की होड़ बढ़ जाए. व्यवहार में अचानक बदलाव आ जाए तो सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि पैसा कहां से आया? सवाल यह भी होना चाहिए कि बच्चे के भीतर चल क्या रहा है?
गुरु और स्टूडेंट के बीच भरोसा बचाना होगा
हमारे यहां गुरु-शिष्य का रिश्ता हमेशा सम्मान का रिश्ता माना गया है लेकिन बदलते समय में इस रिश्ते के सामने नई चुनौतियां हैं.सोशल मीडिया का दबाव है.महंगी चीजों की चाह है. दोस्तों के बीच खुद को साबित करने की होड़ है.पढ़ाई और करियर का दबाव है. परिवार की आर्थिक परेशानियां हैं और इसके साथ बच्चों के भीतर बढ़ता गुस्सा भी है.इन सबके बीच स्कूल सिर्फ किताबें पढ़ाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकता.उसे बच्चों को यह भी सिखाना होगा कि डांट से कैसे निपटना है.हार को कैसे स्वीकार करना है.गुस्से को कैसे नियंत्रित करना है और किसी फैसले से असहमति हो तो अपनी बात कैसे रखनी है.
सबसे डरावनी बात क्या है?
नलगोंडा की कहानी में सबसे डरावनी बात सिर्फ 27 चाकू के वार नहीं हैं.सबसे डरावनी बात यह है कि यह सब योजना बनाकर किया गया.चाकू खरीदे गए.दस्ताने खरीदे गए.CCTV की रैकी की गई.पैसे की उम्मीद में घर चुना गया और फिर पहचान सामने आने पर हत्या कर दी गई यानी यह सिर्फ अचानक आया गुस्सा नहीं था. जांच के मुताबिक इसके पीछे लालच, तैयारी और कथित नाराजगी का पूरा सिलसिला था और यही बात इस घटना को सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं रहने देती.यह हमें स्कूल,परिवार और समाज-तीनों से सवाल पूछने पर मजबूर करती है.
आखिर ये कैसे स्टूडेंट्स हैं?
यह सवाल पूछना आसान है-ये कैसे बच्चे हैं? लेकिन शायद इससे बड़ा सवाल है-इन बच्चों के भीतर ऐसी सोच बनने से पहले हमने क्या देखा और क्या नहीं देखा?हर बच्चा अपराधी नहीं है. लाखों बच्चे स्कूलों में अपने शिक्षकों का सम्मान करते हैं.मेहनत करते हैं और आगे बढ़ते हैं इसलिए इन घटनाओं के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी को कठघरे में खड़ा करना भी गलत होगा लेकिन नलगोंडा और हिसार जैसे मामले यह जरूर बताते हैं कि एक बच्चे के व्यवहार में आने वाले खतरनाक बदलावों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.स्कूल में अच्छे नंबर जरूरी हैं. अनुशासन जरूरी है. नियम जरूरी हैं.