भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय पार्टियां लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहीं. वे राष्ट्रीय दलों के विकल्प के रूप में उभरीं और कई राज्यों में निर्णायक भूमिका निभाईं. स्थिति ऐसी भी बनी कि राष्ट्रीय दलों क्षेत्रीय पार्टियों पर सत्ता के लिए आश्रित होना पड़ा. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन पार्टियों में बार-बार टूट देखने को मिल रही है. शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हुए विभाजन ने क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. टूट से अलग हुए धड़ों को कई बार सत्ता का लाभ मिला, जबकि मूल पार्टी कमजोर हुई. सबसे बड़ा फायदा अक्सर भाजपा को हुआ. भाजपा विरोधी दल टूटते हैं तो अलग हुए धड़ों को फायदा भले हो य़ा ऩ हो, लेकिन भाजपा की ताकत जरूर बढ़ जाती है. महाराष्ट्र में यह साफ-साफ दिखा. बाला साहेब ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना से एकनाथ शिंदे अलग होकर भाजपा के सहयोग से महाराष्ट्र में सीएम बन गए. एनसीपी से समर्थकों को लेकर अलग होने पर अजित पवार को उप मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल गया. निधन के बाद डिप्टी सीएम की कुर्सी पर भाजपा ने उनकी पत्नी को बिठा दिया. पर, बंगाल में टीएमसी से अलग होने वाले इतने भाग्यशली नहीं रहे. पार्टी टूट से ममता बनर्जी को झटका जरूर लगा है, लेकिन अलग हुए गुट को इसका फायदा नहीं मिल पाया. आपस की लड़ाई में टीएमसी को वर्षों पहले स्थापना काल से ही मिला सिंबल छिन गया. ममता बनर्जी और ऋतब्रत खेमे को अलग नाम की पार्टी की नई पहचान और नया निशान आवंटित हो गए. ममता का मोह छोड़ने वाले खेमे को शिवसेना और एनसीपी से अलग होने वाले गुट की तरह इसका कोई लाभ नहीं हुआ. इसलिए कि भाजपा को बंगाल में किसी की मदद की जरूरत ही नहीं है. टीएमसी से अलग हुए सांसद एनसीपीआई के जरिए भाजपा के सहयोगी जरूर बन गए हैं, लेकिन उन्हें भी कोई सियासी लाभ अभी तक नहीं मिला है.
शिवसेना बंटी तो शिंदे को हुआ फायदा
बाबा साहेब ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना महाराष्ट्र की राजनीति का प्रतीक रही. 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ा धड़ा अलग हो गया. शिंदे गुट ने भाजपा का साथ लिया और महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद हासिल किया. उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दोनों गंवा बैठी. शिंदे गुट को मूल शिवसेना का सिंबल और नाम मिला. इस टूट ने महाराष्ट्र की सत्ता का पूरा समीकरण बदल दिया. भाजपा के सहयोग से शिंदे न सिर्फ सत्ता में आए, बल्कि पार्टी की असली पहचान भी अपने पास रख ली. क्षेत्रीय पार्टी की ताकत विभाजन के बाद सत्ताधारी गठबंधन में समाहित हो गई.
NCP के बंटवारे से शरद पवार कमजोर
NCP में भी लगभग यही कहानी दोहराई गई. शरद पवार की पार्टी से अजित पवार अलग हुए और भाजपा-शिवसेना गठबंधन में शामिल हो गए. अजित पवार को उप मुख्यमंत्री का पद मिला. बाद में चुनाव आयोग ने अजित पवार गुट को ही मूल NCP का नाम और घड़ी का सिंबल आवंटित कर दिया. शरद पवार को नई पार्टी बना कर नई पहचान से चुनाव लड़ना पड़ा. अजित पवार के निधन के बाद भी डिप्टी सीएम की कुर्सी पर उनके परिवार के सदस्य ही बने रहे, लेकिन मूल पार्टी की ताकत काफी कमजोर पड़ गई. महाराष्ट्र में दो बड़े क्षेत्रीय दलों के विभाजन ने विपक्ष को बिखेर दिया और भाजपा की पकड़ मजबूत कर दी.
TMC की टूट से दोनों धड़ों को नुकसान
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद पार्टी में ऐतिहासिक टूट हुई. ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में करीब 58-60 विधायकों ने बगावत कर दी. विधानसभा स्पीकर ने ऋतब्रत गुट को नेता प्रतिपक्ष मान लिया. ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी वाले गुट तथा ऋतब्रत-अरूप राय वाले गुट के बीच नाम और सिंबल को लेकर लड़ाई हुई. सितंबर 2026 में चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश में टीएमसी का पारंपरिक नाम और घास-फूल सिंबल दोनों फ्रीज कर दिए. ममता गुट को ममता आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम और फुटबाल प्लेयर सिंबल मिला, जबकि ऋतब्रत गुट को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस नाम और लिफाफा सिंबल आवंटित हुआ. शिवसेना और NCP के विपरीत यहां दोनों धड़ों को नुकसान हुआ. अलग हुए गुट को सत्ता का कोई तात्कालिक लाभ नहीं मिला, क्योंकि बंगाल में भाजपा पहले से मजबूत स्थिति में है. कुछ बागी सांसद एनसीपीआई के जरिए भाजपा के सहयोगी जरूर बने, लेकिन उन्हें भी कोई बड़ा सियासी लाभ अभी तक नहीं मिला है.
AAP टूटी तो नहीं, मगर टूट गए सांसद
आम आदमी पार्टी में पूर्ण विभाजन नहीं हुआ, लेकिन कुछ सांसद अलग हो गए. अलग हुए सांसदों ने भाजपा का रुख किया. इससे दिल्ली और पंजाब में पार्टी की पकड़ कमजोर हुई. पूर्ण टूट न होने के बावजूद आंतरिक असंतोष और नेताओं के पलायन ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया. पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है. अंदेशा है कि हवा का रुख भांप कर आम आदमी पार्टी के कुछ और नेता भाजपा का रुख कर सकते हैं.
बिहार में राजद में टूट का खतरा बढ़ा
बिहार में राजद पर भी टूट के बादल मंडरा रहे हैं. पार्टी के पास सीमित संख्या में विधायक हैं और आंतरिक असंतोष की खबरें समय-समय पर आती रहती हैं. परिवारवाद और नेतृत्व को लेकर सवाल उठते रहे हैं. अगर राजद में भी विभाजन होता है तो बिहार की विपक्षी राजनीति और बिखर जाएगी. एनडीए के नेता अक्सर दावा करते हैं कि राजद के विधायक उनके संपर्क में हैं. राजद के कुल 25 विधायक हैं. उनमें एक ने तो राज्यसभा चुनाव में राजद का साथ नहीं दिया था. विधायकों की सीमित संख्या के कारण विधायकों को दल बदलने में ज्यादा मुश्किल भी नहीं आएगी.
विपक्षी दलों में टूट से BJP मजबूत
शिवसेना, NCP और TMC जैसे उदाहरण साफ बताते हैं कि क्षेत्रीय पार्टियों में टूट होने से सबसे बड़ा फायदा भाजपा को होता है. महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार बनी, बंगाल में विपक्ष कमजोर हुआ और संसद में भी संख्या बल प्रभावित हुआ. क्षेत्रीय दल जब बिखरते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की एकजुटता टूटती है. भाजपा इन स्थितियों का लाभ उठा कर अपनी पहुंच बढ़ाती रही है.
राहुल मढ़ रहे हैं EC-BJP पर दोष
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने टीएमसी के सिंबल विवाद पर चुनाव आयोग और भाजपा पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा है कि पहले शिवसेना, फिर NCP और अब TMC- हर बार एक ही पैटर्न दिखता है. पार्टी तोड़ने वाली ताकतों के साथ चुनाव आयोग भी मिल जाता है और चुनाव चिह्न छीन लिया जाता है. राहुल गांधी के अनुसार यह लोकतंत्र के पतन का संकेत है. वे इसे पार्टी की चोरी बताते हैं. बहरहाल, क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व संकट में दिख रहा है. सत्ता का लालच, आंतरिक लोकतंत्र की कमी, परिवारवाद और बाहरी दबाव इन टूटों के प्रमुख कारण हैं. शिवसेना और NCP में अलग हुए धड़ों को सत्ता मिली, लेकिन TMC में दोनों पक्षों को नुकसान उठाना पड़ा. अगली बारी किस पार्टी की होगी, यह सवाल अब राजनीतिक हलकों में आम है. अगर क्षेत्रीय दल आंतरिक सुधार और एकजुटता नहीं दिखाते तो उनका अस्तित्व और संकट में पड़ सकता है.