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West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 24 घंटे के भीतर दो नामांकन वापसी ने हलचल बढ़ा दी है. नंदीग्राम से ममता बनर्जी गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने 18 सितंबर को अपना नामांकन वापस लिया. अगले दिन रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी ने भी चुनाव से हटने का फैसला कर लिया. दोनों का राजनीतिक करियर अलग है. संचिता लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस से जुड़ी रही हैं और पंचायत स्तर पर जिम्मेदारियां संभाल चुकी हैं. रबीउल कांग्रेस के टिकट पर दो बार विधायक रहे और 2021 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर रेजीनगर से जीते. अब दोनों के चुनाव से हटने के बाद बंगाल की सियासत में नए समीकरण बन रहे हैं. इस खबर में पढ़ें दोनों के राजनीतिक करियर के बारे में.
नंदीग्राम की संचिता प्रधान डे और रेजीनगर के रबीउल आलम चौधरी ने नामांकन वापस लिया. (फोटो PTI/FB)
पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले 24 घंटे काफी हलचल वाले रहे हैं. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट ने पहले अपना चुनाव चिह्न और नाम खोया. उसके बाद नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव के लिए जिन दो उम्मीदवारों पर भरोसा जताया थ उन्होंने नाम वापस ले लिया. मतलब दोनों ने चुनावी मैदान छोड़ दिया है. पहले नंदीग्राम से संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस लिया. इसके करीब एक दिन के भीतर रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी ने भी चुनाव नहीं लड़ने का फैसला कर लिया. दोनों घटनाओं ने बंगाल की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है. हालांकि इन दोनों घटना के बीच एक और घटना घटी नंदीग्राम कैंडिडेट को जैसे ही ममता बनर्जी ने अपना समर्थन दिया उनकी गिरफ्तारी हो गई. कांग्रेस कैंडिडेट मिलन प्रधान की गिरफ्तारी एक पुराने केस में हुई है. इन तमाम घटनाओं में नंदीग्राम और रेजीनगर का राजनीतिक महत्व अलग-अलग है. नंदीग्राम का नाम ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी की चुनावी लड़ाई से जुड़ा रहा है. वहीं रेजीनगर में भी मुकाबला बदल गया है. अब नजर इस बात पर है कि आखिर ये दोनों चेहरे कौन हैं और इनके चुनाव से हटने की कहानी क्या है.
कौन हैं संचिता प्रधान डे?
- संचिता प्रधान डे पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम इलाके से आती हैं. वह बोयाल-2 ग्राम पंचायत की रहने वाली बताई जाती हैं. पेशे से वह टीचर हैं और बोयाल प्राइमरी स्कूल या नॉर्थ बोयाल प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती रही हैं. स्थानीय राजनीति में उनकी पहचान अचानक नहीं बनी. वह लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस से जुड़ी रही हैं. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उनका पार्टी से जुड़ाव 2008 से है. इसके बाद उन्होंने पंचायत स्तर पर अपनी राजनीतिक जगह बनाई. 2013 में वह तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर नंदीग्राम पंचायत समिति की सदस्य चुनी गईं. उस दौरान उन्हें महिला एवं बाल कल्याण विभाग की जिम्मेदारी मिली. 2018 में उन्होंने फिर पंचायत समिति का चुनाव जीता और शिक्षा विभाग की कर्माध्यक्ष बनीं.
- संचिता के राजनीतिक सफर में 2023 का पंचायत चुनाव एक अहम मोड़ रहा. उस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया. इसके बाद उनकी सक्रियता स्थानीय स्तर पर बनी रही. सितंबर 2026 में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने उन्हें नंदीग्राम उपचुनाव में उम्मीदवार बनाया. यह वही नंदीग्राम है जहां ममता बनर्जी 2021 में चुनाव लड़ चुकी हैं और सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें मात दी थी. संचिता ने उम्मीदवार बनने के बाद नामांकन दाखिल किया. 18 सितंबर को उन्होंने सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात की. इसके बाद उन्होंने अपना नामांकन वापस ले लिया. नामांकन वापसी के बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान के समर्थन का ऐलान किया. संचिता के इस फैसले ने नंदीग्राम के उपचुनाव को फिर चर्चा में ला दिया.
कौन हैं रबीउल आलम चौधरी?
- रबीउल आलम चौधरी मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा क्षेत्र के मिर्जापुर इलाके के रहने वाले हैं. उनका राजनीतिक सफर संचिता से काफी अलग है. वह खेती और सामाजिक कार्य से भी जुड़े रहे हैं. उनकी शैक्षणिक योग्यता बी.कॉम बताई जाती है. उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध एसआरएफ कॉलेज से 1983 में पढ़ाई पूरी की. उनका परिवार भी राजनीति से जुड़ा रहा है. वह पूर्व विधायक नुरुल चौधरी के भतीजे हैं. रबीउल ने सक्रिय राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से की. 2013 में रेजीनगर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधायक बने. 2016 में भी उन्होंने इसी सीट से कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की.
- 2021 में रबीउल आलम चौधरी तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए. उसी साल उन्होंने रेजीनगर से तृणमूल के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीता. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक उन्हें 1,18,494 वोट मिले थे और उनका वोट शेयर 56.73 प्रतिशत रहा था. 2021 से 2026 तक वह रेजीनगर के विधायक रहे. सितंबर 2026 में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने उन्हें फिर रेजीनगर उपचुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया. यह सीट हुमायूं कबीर के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी. लेकिन 19 सितंबर को रबीउल ने अपना नामांकन वापस ले लिया. उन्होंने कहा कि पार्टी को नया चुनाव चिह्न मिलने के बाद कार्यकर्ताओं को चुनाव मैदान में उतारना मुश्किल हो रहा था. उन्होंने दबाव और कुछ लोगों की गिरफ्तारी का भी जिक्र किया. उनके इस फैसले के बाद रेजीनगर में भी चुनावी समीकरण बदल गए हैं.
24 घंटे में दो नामांकन वापसी ने बढ़ाई हलचल
नंदीग्राम और रेजीनगर के घटनाक्रम को अलग-अलग देखा जाए तो दोनों उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि अलग है. संचिता प्रधान डे स्थानीय पंचायत राजनीति से निकलकर विधानसभा उपचुनाव की उम्मीदवार बनी थीं. रबीउल आलम चौधरी पहले कांग्रेस और फिर तृणमूल कांग्रेस के विधायक रहे हैं. दोनों का चुनावी अनुभव भी एक जैसा नहीं है. फिर भी दोनों के नामांकन वापस लेने का समय एक साथ राजनीतिक चर्चा का कारण बन गया है. इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा विवाद और चुनाव आयोग का अंतरिम आदेश है. दोनों गुटों को पार्टी के पुराने नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोकने के बाद चुनावी मैदान में नई परिस्थितियां बनीं. नंदीग्राम में संचिता के हटने के बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन दिया है. रेजीनगर में रबीउल के हटने के बाद मुकाबले का अगला स्वरूप क्या होगा. यह चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ साफ होगा. फिलहाल दोनों नामांकन वापसी ने पश्चिम बंगाल के उपचुनाव को फिर सुर्खियों में ला दिया है.
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सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 4 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह…
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