नई दिल्ली (Worst Engineering Branches). हर पीढ़ी के युवाओं में डॉक्टर या इंजीनियर बनने का क्रेज सिर चढ़कर बोलता है. 12वीं की परीक्षाएं खत्म होते ही लाखों स्टूडेंट्स के सामने कॉलेज और कोर्स से जुड़ा सवाल रहता है. एक दौर में इंजीनियरिंग का मतलब सिर्फ कंप्यूटर साइंस नहीं था. सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल जैसी ब्रांचेज इंजीनियरिंग की रीढ़ मानी जाती थीं. यही बीटेक कोर्स सरकारी नौकरी या हाई पेइंग सैलरी की गारंटी माने जाते थे. लेकिन बदलते वक्त के साथ इनकी चमक फीकी पड़ चुकी है.
सबसे कम एडमिशन रेट वाले 5 इंजीनियरिंग कोर्स
वक्त बहुत तेजी से बदल रहा है. इसके साथ ही स्टूडेंट्स का स्टडी पैटर्न और जॉब मार्केट के हालात भी बदल रहे हैं. जानिए 5 ऐसे बीटेक कोर्स, जो पहले हर स्टूडेंट की पहली पसंद होते थे लेकिन आज आखिरी चॉइस में भी जगह नहीं बना पा रहे हैं:
1. सिविल इंजीनियरिंग: कंक्रीट के सपनों का घटता क्रेज
कभी इंफ्रास्ट्रक्चर की पहचान मानी जाने वाली सिविल इंजीनियरिंग आज स्टूडेंट्स की प्रायोरिटी लिस्ट से लगभग गायब हो चुकी है. जेईई एडमिशन के आंकड़ों ने दिखाया कि टॉप रैंकर्स ने इस ब्रांच से मुंह मोड़ लिया है. आज के दौर में कंस्ट्रक्शन साइट्स पर शुरुआती मेहनत बहुत ज्यादा होती है. उस हिसाब से शुरुआती पैकेज काफी कम मिलते हैं. इसके अलावा, प्राइवेट सेक्टर में जॉब स्टेबिलिटी न होना और फील्ड वर्क की कठिन चुनौतियां भी युवाओं को इस तरफ आने से रोक रही हैं.
2. मेटलर्जी और मटीरियल साइंस: फीकी पड़ी धातु की चमक
मेटलर्जी और मटीरियल साइंस इंजीनियरिंग की बेहद पुरानी और कोर ब्रांच है. एक दौर में स्टील प्लांट्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इस ब्रांच के इंजीनियर की भारी डिमांड हुआ करती थी. लेकिन आज के स्टूडेंट्स सॉफ्टवेयर और टेक सेक्टर की तरफ ज्यादा आकर्षित हैं. इस ब्रांच में लैब्स का भारी काम, जॉब्स के सीमित अवसर और कोर कंपनियों में कम सैलरी हाइक के कारण आज के होनहार युवा इसे अपनी लिस्ट में सबसे नीचे रखते हैं.
3. टेक्सटाइल इंजीनियरिंग: कपड़ों की दुनिया से युवाओं का मोहभंग
कपड़ा उद्योग हमारे देश के सबसे पुराने और बड़े उद्योगों में से एक है. टेक्सटाइल इंजीनियरिंग कभी इसके विकास की रीढ़ हुआ करती थी. लेकिन आज के इंजीनियरिंग एस्पिरेंट्स के बीच यह ब्रांच आउटडेटेड हो चुकी है. मौजूदा दौर के स्टूडेंट्स को कोडिंग, रोबोटिक्स और एआई जैसी टेक्नीक्स आकर्षित करती हैं, जबकि टेक्सटाइल का दायरा मुख्य रूप से मिलों और गारमेंट इंडस्ट्री तक सिमट कर रह गया है. यही वजह है कि इस कोर्स में एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स की संख्या लगातार घटती जा रही है.
4. एयरोस्पेस इंजीनियरिंग: आसमान छूने का सपना लेकिन करियर की अनिश्चितता
स्पेस, सैटेलाइट और एविएशन के क्षेत्र से जुड़ी एयरोस्पेस इंजीनियरिंग सुनने में भले ही बेहद रोमांचक और ग्लैमरस लगे, लेकिन सच तो यही है कि आज के टॉपर्स इसे चुनने से डरते हैं. हालिया काउंसलिंग ट्रेंड्स बताते हैं कि देश के टॉप-500 रैंकर्स ने इस बार एयरोस्पेस इंजीनियरिंग को नकार दिया. इसकी मुख्य वजह है कि भारत में इस क्षेत्र में प्राइवेट जॉब्स के अवसर बहुत सीमित हैं. वहीं इसरो या डीआरडीओ जैसी सरकारी संस्थाओं तक पहुंचना आसान नहीं है.
5. बायोमेडिकल और बायो इंजीनियरिंग: उम्मीदों पर खरी न उतरने वाली ब्रांच
मेडिकल और टेक्नोलॉजी के मेल से बनी बायोमेडिकल इंजीनियरिंग को कभी भविष्य की तकनीक कहा गया था. लेकिन हकीकत में यह ब्रांच स्टूडेंट्स के बीच अपनी साख बनाने में नाकाम रही है. भारत में हॉस्पिटल्स और मेडिकल इक्विपमेंट इंडस्ट्री में इस सेक्टर के प्रोफेशनल्स के लिए उस स्तर की नौकरी या सैलरी नहीं हैं, जैसी आईटी सेक्टर में मिलती है. कोर इंजीनियरिंग और मेडिकल साइंस के बीच उलझकर रह जाने के कारण स्टूडेंट्स इस रिस्की ब्रांच से दूरी बना रहे हैं.