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उत्तराखंड में एक ऐसा रहस्यमयी मंदिर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण एक ही रात में हुआ था. इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां स्थापित मूर्ति दिन में तीन बार अपना रूप बदलती है. नेपाल के एक विशेष राजवंश के लोग इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने आते हैं, जिससे इसकी रहस्यमयता और भी बढ़ जाती है. यह मंदिर अपनी अद्भुत विशेषताओं के कारण भक्तों और शोधकर्ताओं दोनों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है.
उत्तराखंड की मनमोहक वादियों में देवी-देवताओं का वास मिलता है. ऐसा ही अल्मोड़ा जिले में शीतलाखेत के पास प्राचीन और प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां स्याही देवी मंदिर स्थित है. शांत वातावरण और पहाड़ों के बीच स्थित मंदिर एक दिन में तैयार किया गया था. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर में माता की मूर्ति दिन में तीन बार अपना रूप बदलती है. इस मंदिर के बारे में कई रोचक मान्यताएं और लोककथाएं प्रचलित हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कत्युरी शासनकाल में हुआ था और इसकी प्राचीनता लगभग 900 से 1700 वर्ष के बीच मानी जाती है. मां स्याही देवी अल्मोड़ा के राजाओं की कुलदेवी भी माना जाता है.
कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण केवल एक रात में हुआ था. लोककथाओं के अनुसार, स्थानीय लोगों ने मंदिर के लिए ईंटें तैयार की थीं. लेकिन उस रात बहुत तेज बारिश हुई थी, जब गांववाले अगली सुबह वहां पहुंचे तो देखा कि ईंटें पकी हुई मिलीं थीं. इतना ही नहीं, मंदिर को जोड़ने के लिए मंदिर को जोड़ने में चूने या सीमेंट की जगह बेल और गुड़ के मिश्रण का प्रयोग हुआ, जो आज भी लोगों को अचंभित करता है.
यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर के बनने से पहले, स्याही देवी की असली मूर्ति लगभग आधा किलोमीटर दूर एक दूसरी पहाड़ी पर स्थापित थी. स्याही देवी को अल्मोड़ा के राजाओं की कुल देवी माना जाता था. इसलिए, राजाओं ने इस जगह पर अपनी देवी के लिए एक नया और बड़ा मंदिर बनवाया.
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जब मंदिर बन गया, तो रोज की पूजा-पाठ और मंदिर की देखभाल के लिए नेपाल से गुरु गोरखनाथ के वंशजों को यहां लाया गया. आज भी उसी वंश के लोग इस मंदिर की पूजा और व्यवस्था संभालते हैं. यह भी कहा जाता है कि कत्यूरी राजा बहुत अच्छे कारीगर और शिल्पकार थे, लेकिन वे अपना सारा निर्माण काम सिर्फ रात में ही करते थे. इसी वजह से कहा जाता है कि यह मंदिर भी सिर्फ एक ही रात में बना था.
स्याही देवी को आसपास के 52 गांवों की इष्ट देवी माना जाता है और उत्तराखंड के अनेक परिवार इन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती हैं. इसी वजह से देशभर से कई श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर माता के दर्शन करने के लिए आते हैं.
मंदिर की सबसे रहस्यमय बात यह बताई जाती है कि यहां स्थापित माता की मूर्ति का रंग दिन में तीन बार बदलता है. सुबह, दोपहर और शाम के समय मूर्ति का रंग अलग-अलग दिखाई देता है. भक्त इसे माता की दिव्य शक्ति और जीवंत उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं. माना जाता है कि वर्ष 1898 में स्वामी विवेकानंद भी यहां आए थे और उन्होंने इस पवित्र स्थान पर ध्यान व साधना की थी. इसी वजह से यह मंदिर कई संतों और साधकों की तपस्थली के रूप में भी प्रसिद्ध हो गया.