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रासायनिक कीटनाशकों से परेशान किसानों के लिए राहत की खबर है. अब दीमक, सुंडी, ग्रब और सफेद मक्खी जैसे खतरनाक कीटों से बिना ज्यादा रसायन के भी बचाव संभव है.कृषि विशेषज्ञों ने दो जैविक फंगस के इस्तेमाल की सलाह दी है, जो फसल की सुरक्षा के साथ मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हैं. प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हैं.
खेती में रासायनिक कीटनाशकों का लगातार बढ़ता उपयोग मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ी चिंता बनता जा रहा है। यही कारण है कि अब बड़ी संख्या में किसान जैविक खेती और प्राकृतिक कीट नियंत्रण के विकल्प अपना रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खेत में दीमक, सुंडी, ग्रब या सफेद मक्खी जैसी समस्याएं बार-बार सामने आ रही हैं, तो रासायनिक दवाओं पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय जैविक फंगस का इस्तेमाल बेहतर और टिकाऊ समाधान साबित हो सकता है.
प्रगतिशील किसान मनसुखलाल कुशवाहा ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए बताया कि बवेरिया बेसियाना और मेटारिजियम एनिसोप्ली ऐसे लाभकारी जैविक फंगस हैं, जो खेत में मौजूद कई हानिकारक कीटों को प्राकृतिक तरीके से नियंत्रित करते हैं. इनका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये केवल नुकसान पहुंचाने वाले कीटों पर असर डालते हैं, जबकि खेत में मौजूद लाभदायक कीटों और सूक्ष्म जीवों को नुकसान नहीं पहुंचाते. इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता भी बनी रहती है.
करीब 80 किलोग्राम जैविक खाद तैयार होता
मनसुखलाल ने बताया कि इस जैविक मिश्रण को तैयार करने के लिए 3 किलोग्राम बवेरिया बेसियाना या मेटारिजियम एनिसोप्ली को 75 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाना चाहिए. इसके बाद मिश्रण पर प्रतिदिन हल्का पानी छिड़ककर नमी बनाए रखें. लगभग 8 से 10 दिनों में फंगस अच्छी तरह विकसित हो जाता है और करीब 80 किलोग्राम जैविक खाद तैयार हो जाती है.विशेषज्ञों के अनुसार, तैयार मिश्रण का उपयोग खेत की अंतिम जुताई से पहले या जुताई के दौरान पूरे खेत में समान रूप से बिखेर देना चाहिए। इसके बाद जुताई करने से यह मिश्रण मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाता है. इससे मिट्टी में मौजूद दीमक के अंडे, लार्वा, ग्रब और अन्य हानिकारक कीटों की संख्या को नियंत्रित करने में मदद मिलती है. तैयार किया गया यह मिश्रण एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त माना जाता है.
मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती
कृषि वैज्ञानिक डॉ. शैलेंद्र गौतम का कहना है कि जैविक फंगस का नियमित और वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल करने पर फसल को प्राकृतिक सुरक्षा मिलती है. इससे रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता कम होती है, उत्पादन लागत घटती है और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है. इसके साथ ही पर्यावरण पर भी इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता.डॉ. शैलेंद्र किसानों को सलाह देते हैं कि जैविक फंगस का उपयोग करते समय गोबर की खाद पूरी तरह सड़ी हुई हो और मिश्रण में पर्याप्त नमी बनाए रखी जाए. सही विधि से तैयार और उपयोग किया गया यह जैविक मिश्रण न केवल फसल को कीटों से बचाता है, बल्कि टिकाऊ और प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा देता है. अब देश के कई हिस्सों में किसान रासायनिक दवाओं के विकल्प के रूप में जैविक फंगस को तेजी से अपना रहे हैं.